
नई दिल्ली। बाबरी मस्जिद ध्वंस (Demolition of the Babri Masjid) की बरसी पर उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh)के सलेमपुर से भाजपा सांसद (BJP MP) रवींद्र कुशवाहा का मथुरा (Mathura) को लेकर बयान सामने आया है। उन्होंने कहा कि कहा कि भाजपा का शुरू से ही काशी, मथुरा और अयोध्या को लेकर स्पष्ट मत रहा है। यह तीनों हमारे लिए आस्था का विषय हैं। अयोध्या का फैसला हो गया। काशी विश्वनाथ मंदिर में कार्य तेजी से जारी है तथा अब मथुरा की बारी है। कुशवाहा से पूछा गया कि जब देश में उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 लागू है तो फिर मथुरा में मंदिर निर्माण मामले का समाधान कैसे होगा, इसके जवाब में उन्होंने कहा - जब मोदी सरकार किसानों के विरोध को देखते हुए तीनों नए कृषि कानूनों (Three Farm Laws) को वापस ले सकती है तो फिर मथुरा में जन्मभूमि पर भव्य मंदिर के निर्माण के लिए उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 को भी वापस लिया जा सकता है। आइये, जानते हैं कि उपासना स्थल अधिनियम 1991 क्या है और यह क्यों लाया गया था...
प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 :
प्लेसेज ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजन) एक्ट, 1991 या उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम 18 सितंबर 1991 को पारित किया गया था। इसके मुताबिक 15 अगस्त 1947 की तारीख में जो धार्मिक स्थल जिस धर्म का था, उसी के पास रहेगा। हालांकि, अयोध्या के श्री रामजन्म भूमि और बाबरी मस्जिद मामले को इस कानून से अलग रखा गया था। इस अधिनियम के मुताबिक किसी स्मारक का धार्मिक आधार पर रखरखाव नहीं किया जा सकता है। मान्यता प्राप्त प्राचीन स्मारकों पर उपासना स्थल कानून की धाराएं लागू नहीं होती हैं। बाबरी मस्जिद ढांचे को गिराने से एक साल पहले 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार यह कानून लाई थी। यह अधिनियम जम्मू और कश्मीर राज्य को छोड़कर पूरे भारत में लागू किया गया।
क्यों लाना पड़ा ये कानून :
1991 में अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि का आंदोलन तेजी से चल रहा था। अयोध्या का मामला गरम था ही, मथुरा और काशी में भी ऐसी ही स्थित हो सकती थी। मथुरा में श्री कृष्ण जन्मस्थल से सटी मस्जिद हो या वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर से लगी ज्ञानवापी मस्जिद दोनों के निर्माण और पुनर्निमाण को लेकर कई तरह के विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे धार्मिक स्थलों पर विवाद न गहराए, इसको लेकर 1991 में ये कानून पास करना पड़ा।
कानून के इस प्रावधान ने खत्म किए विवाद
इस एक्ट के तहत आजादी के दिन किसी जगह पर मंदिर था तो उस जगह पर मुस्लिम या कोई अन्य धर्म अपना दावा नहीं ठोंक सकते। भले ही आजादी से पहले वहां पर किसी अन्य धर्म का स्थल क्यों न रहा हो। इसी तरह 15 अगस्त, 1947 को किसी जगह पर मस्जिद थी तो वह जमीन मस्जिद की ही मानी जाएगी। चाहे आजादी से पहले वहां मंदिर क्यों न रहा हो।
इसलिए दायरे में नहीं अयोध्या : इस कानून से अयोध्या को बाहर इसलिए रखा गया क्योंकि कानून बनने के वक्त अयोध्या का मुद्दा जन-जन की आवाज बन चुका था। उस समय कानून में इसे शामिल किया जाता तो नया विवाद पैदा हो सकता था। इसलिए अयोध्या को इस एक्ट से दूर रखा गया।
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