
Virginity test unconstitutional: दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक महिला आरोपी की वर्जिनिटी टेस्ट पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी महिला का वर्जिनिटी टेस्ट करना असंवैधानिक, सेक्सिस्ट और उसके सम्मान के अधिकार का उल्लंघन है। किसी भी महिला या युवती के लिए ऐसा टेस्ट बेहद अमानवीय है। ऐसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है जो वर्जिनिटी टेस्ट का प्रावधान करता हो। दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने केरल में सिस्टर अभया डेथ केस में सिस्टर सेफी की याचिका पर यह आदेश पारित किया है।
कौन हैं सिस्टर सेफी?
दरअसल, सिस्टर सेफी ने याचिका में एक आपराधिक मामले में उनके वर्जिनिटी टेस्ट को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की थी। केरल के कोट्टायम में सिस्टर अभया की मौत 1992 में रहस्यमय परिस्थितियों में हुई थी। कुंए में सिस्टर अभया की लाश मिली थी। इस केस में केरल की एक ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2020 में फादर थॉमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। कोट्टायम में सिस्टर अभया की हत्या के लिए दोषी ठहराया था और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, निचली अदालत के आदेश के खिलाफ एक अपील केरल उच्च न्यायालय में लंबित है।
सिस्टर सेफी का वर्जिनिटी टेस्ट जबरिया किया था सीबीआई ने...
याचिकाकर्ता सिस्टर सेफी ने हाईकोर्ट के समक्ष आरोप लगाया था कि 2008 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा उसके मामले को साबित करने के लिए एजेंसी की जांच के बहाने जबरन वर्जिनिटी टेस्ट किया गया था और परिणाम लीक कर दिए गए थे। सिस्टर सेफी की याचिका का सीबीआई द्वारा विरोध किया गया था। सीबीआई ने तर्क दिया गया था कि मेडिकल परीक्षण कराना उसके अधिकार में था और हत्या के मामले की जांच के लिए परीक्षण आवश्यक था।
कोर्ट ने कहा कि जब वह जांच नहीं कर रही थी कि जांच के लिए परीक्षण आवश्यक था या नहीं, सच्चाई का पता लगाने के बहाने अभियुक्त पर परीक्षण करना उसके अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि उसके खिलाफ आरोपों के बारे में सच्चाई तक पहुंचने के बहाने वर्जिनिटी टेस्ट करना अनुच्छेद 21 में निहित उसके अधिकार का उल्लंघन है।
वर्जिनिटी टेस्ट पर क्या कहा कोर्ट ने?
न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने आरोपी की वर्जिनिटी टेस्ट को असंवैधानिक घोरित करते हुए महिला के गरिमा के खिलाफ इस टेस्ट को बताया। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि यह घोषित किया जाता है कि जांच के तहत या पुलिस की हिरासत में आरोपी महिला बंदी का कौमार्य परीक्षण असंवैधानिक है और संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है जिसमें गरिमा का अधिकार भी शामिल है। इसलिए, यह अदालत मानती है कि यह परीक्षण सेक्सिस्ट है और महिला अभियुक्त की भी गरिमा के मानवाधिकार का उल्लंघन है, अगर उसे हिरासत में रहते हुए इस तरह के परीक्षण के अधीन किया जाता है।
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि महिला यौन उत्पीड़न पीड़ितों पर टू-फिंगर टेस्ट या वर्जिनिटी टेस्ट पहले ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उनके सम्मान, अखंडता और निजता के अधिकार का उल्लंघन माना गया है। एक महिला की हिरासत की गरिमा की अवधारणा में पुलिस हिरासत में रहते हुए भी सम्मान के साथ जीने का अधिकार शामिल है और उस पर वर्जिनिटी टेस्ट करना न केवल उसकी शारीरिक अखंडता के साथ मनोवैज्ञानिक अखंडता का उल्लंघन है। वर्जिनिटी टेस्ट वैज्ञानिक या मेडिकल टेस्ट न बनकर आजकल महिला की पवित्रता का प्रतीक बनता जा रहा है। वर्जिनिटी टेस्ट एक प्रकार का शारीरिक आक्रमण है। इस तरह के टेस्ट अपमानित होने की भावना आती है।
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