
नई दिल्ली। ओमान का बेहद अद्भुत शहर ग्वादर आज भारत का हिस्सा होता। जी हां, ओमान ने वर्ष 1950 में भारत के सामने इस अनोखे द्वीप शहर को खरीदने का प्रस्ताव रखा था लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ऑफर को ठुकरा दिया था। इसके कुछ सालों बाद पाकिस्तान ने इस द्वीप को खरीद लिया था। पंडित नेहरू ने ओमान को हां कहा होता तो आज ग्वादर भारत का हिस्सा होता।
हथौड़े जैसा दिखने वाला शहर
ओमान का हथौड़े जैसा दिखने वाला ये अद्भुत शहर काफी खूबसूरत है और फिशिंग के लिए काफी चर्चित है। इस शहर को वर्ष 1950 में ओमान में भारत को खरीदने के लिए ऑफर किया था लेकिन भारत की ओर से दिलचस्पी नहीं दिखाई गई। उस वक्त देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। उन्होंने उस दौरान मछली पकड़ने वाले इस छोटे से गांव को लेने से इनकार कर दिया था। आज ये एक स्ट्रैटेजिक पोर्ट बन चुका है।
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पाकिस्तान में शामिल है ये खूबसूरत द्वीप शहर
जैसा कि पता है कि ओमान ने भारत को पहले ग्वादर लेने का प्रस्ताव पेश किया था लेकिन उसके इनकार के बाद 1958 में इस प्रस्ताव को पाकिस्तान ने स्वीकार कर लिया। पाकिस्तान ने इस द्वीप शहर को तीन मिलियन पाउंड में खरीद लिया। ये शानदार शहर भारत का हो सकता था लेकिन क्यों पंडित नेहरू ने इसे ऑफर को ठुकरा दिया आइए जानते हैं इसकी वजह।
इस लिए नेहरू ने नहीं लिया था ग्वादर
ग्वादर का प्रस्ताव ठुकराने का निर्णय नेहरू का अकेला का नहीं था। ओमानी प्रस्ताव को अस्वीकार करने का निर्णय सभा सलाहकारों से बात के बाद परिस्थितियों के तहत तय हुआ था। राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ प्रमित पाल चौधरी बताते हैं कि तत्कालीन विदेश सचिव सुबिमल दत्त और भारतीय खुफिया ब्यूरो प्रमुख बीएन मलिक ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार न करने की सिफारिश की थी। यदि इस प्रस्ताव को स्वीकार किया गया होता तो यह बिना किसी लैंड रीच के पाकिस्तान सीमा एक भारतीय परिक्षेत्र जैसा होता। स्थिति वैसी ही होती जैसी पाकिस्तान को बांग्लादेश के साथ तार्किक रूप से सीमा क्षेत्र की समस्या का सामना करना पड़ा था।
पाकिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा बंदरगाह
हथौड़े जैसे आकार वाला ग्वादर पोर्ट मछली पकड़ने के लिए काफी मुफीद है। फिलहाल ये पाकिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा पोर्ट है। हांलाकि ग्वादर पोर्ट हमेशा से पाकिस्तान का हिस्सा नहीं था। यह 1950 के दशक में लगभग 200 वर्षों तक ओमानी शासन के अधीन था।
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