
बेंगलुरु। कर्नाटक हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि अगर कोई सहकारी समिति बैंक से लिए गए कर्ज को नहीं चुकाती है तो उसके द्वारा SC/ST को दी गई जमीन पर बैंक कब्जा नहीं कर सकती। इस तरह की जमीन पर सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी सहकारी समिति की होने पर भी SC/ST (कुछ भूमि के हस्तांतरण का निषेध) अधिनियम के चलते उसे बैंक कुर्क नहीं करेगी।
इस मामले में जस्टिस सूरज गोविंदराज की एकल पीठ ने फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा, "जब अनुदान में जमीन पाने वाले को GPA होल्डर द्वारा लिए गए कर्ज से कोई फायदा नहीं होता है तो बैंक और अनुदान प्राप्तकर्ता के बीच किसी प्रकार के अनुबंध का सवाल ही नहीं उठता। सोसायटी ने संपत्ति पर कोई अधिकार न होने के बाद भी उसे बैंक के पास बंधक रखा है। बैंक ने यह अच्छी तरह जानते हुए भी कि सोसायटी जमीन की मालिक नहीं है बंधक स्वीकार किया है। ऐसे में बैंक के पास उस जमीन पर कब्जा करने का अधिकार नहीं है।"
क्या है मामला, जिसमें कर्नाटक हाईकोर्ट ने दिया ये फैसला?
जवाहर हाउस बिल्डिंग को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड ने लेआउट तैयार करने के लिए जमीन खरीदी। इसके लिए बैंक से 2 करोड़ रुपए कर्ज लिया। कर्ज के पैसे नहीं लौटाए गए तो बैंक ने सहकारी समितियों के संयुक्त रजिस्ट्रार के सामने इस विवाद को उठाया। इसमें समिति के खिलाफ फैसला आया। संयुक्त रजिस्ट्रार ने उन संपत्तियों को कुर्की करके की अनुमति दी जिन्हें सोसायटी ने बैंक में गिरवी रखा था।
जमीन मुनियम्मा को मिली थी। उन्होंने सहायक आयुक्त से संपर्क किया। आयुक्त ने बैंक द्वारा की जाने वाली जमीन जब्त करने की कार्रवाई पर आपत्ति का आदेश दिया। इसमें कहा गया कि सोसायटी और अनुदान प्राप्तकर्ता के बीच लेनदेन और बैंक व सोसायटी के बीच लेनदेन अलग-अलग और स्वतंत्र है। बैंक अनुदान प्राप्तकर्ता की संपत्ति कब्जा नहीं कर सकती।
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इसके बाद बैंक आयुक्त के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में गई। उसने याचिका में बताया कि कर्ज नहीं लौटाने के मामले में बैंक के पास बंधक रखी गई संपत्ति पर कब्जा करने का पूरा अधिकार है। भले ही यह पीटीसीएल अधिनियम के तहत दिया गया हो। कोर्ट ने इसे नहीं माना।
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