
पटना। देश में लोकसभा चुनाव 2024 हो रहे हैं। राजनीति के मामले में बेहद अहम राज्य बिहार में चुनावी लड़ाई के लिए मोर्चे सज गए हैं। यहां NDA और INDIA के बीच आमने-सामने की टक्कर है। एक तरफ भाजपा, जदयू, लोजपा (चिराग पासवान वाली), हम (जीतन राम मांझी की पार्टी) और RLM (उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी) हैं तो दूसरी ओर राजद, कांग्रेस और वामपंथी दलों का महागठबंधन है।
इस बीच बिहार के तीन दिग्गज नेता ऐसे हैं, जिनका चुनावी लड़ाई में कोई अता-पता नहीं है। इनमें से किसी ने अपनी पार्टी तोड़ दी तो किसी ने पार्टी का विलय कर लिया, लेकिन लोकसभा चुनाव के लिए टिकट की बारी आई तो इनके अरमान आंसुओं में बह गए।
पप्पू यादव रह गए खाली हाथ
पप्पू यादव ने पिछले दिनों अपनी जन अधिकार पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया था। विलय की घोषणा से पहले पप्पू यादव ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की थी। वह पूर्णिया सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे। महागठबंधन में सीटों का बंटवारा होता इससे पहले ही लालू यादव ने पूर्णिया सीट से बीमा भारती को टिकट दे दिया। शुक्रवार को सीट शेयरिंग की घोषणा हुई तो पूर्णिया राजद के खाते में थी। 1999 में पप्पू यादव को पूर्णिया से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत मिली थी।
पशुपति पारस को भतीजे से मिली मात
2019 में हुए लोकसभा चुनाव में लोजपा को पांच सीटों पर जीत मिली थी। अक्टूबर 2020 में लोजपा के संस्थापक रामविलास पासवान का निधन हुआ। इसके कुछ समय बाद लोजपा टूट गई थी। एक गुट पशुपति पारस का तो दूसरा गुट चिराग पासवान का बना। दोनों गुट एनडीए में बने रहे। लोकसभा चुनाव 2024 के लिए सीट शेयरिंग की बात आई तो भाजपा ने चिराग पासवान वाली लोजपा को पांच सीटें दीं। पशुपति पारस (जिनके साथ पांच सांसद थे) को एक सीट भी नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। भतीजे चिराग पासवान से मिली मात के बाद पशुपति का राजनीतिक भविष्य वर्तमान में अधर में है।
मुकेश सहनी को ले डूबी अति महत्वाकांक्षा
बिहार की राजनीति में पिछले वर्षों में मुकेश सहनी एक बड़े नाम के रूप में उभरे थे। वह खुद को मल्लाह जाति का नेता बताते हैं। उन्होंने वीआईपी नाम की पार्टी बनाई थी। 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में वह एनडीए के साथ थे। उनकी पार्टी के चार प्रत्याशी को चुनाव में जीत मिली थी। मुकेश सहनी खुद चुनाव हार गए थे। उन्हें विधान परिषद का सदस्य बनाकर मंत्री पद दिया गया था।
मुकेश उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने पहले यूपी में भाजपा से सीटों की मांग की। बात नहीं बनी तो खुद ही अपने उम्मीदवार उतार दिए। यह भाजपा को पसंद नहीं आया। उनकी पार्टी के सभी विधायक भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद मुकेश को मंत्री पद छोड़ना पड़ा। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले उन्होंने फिर से एनडीए में आने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। दूसरी ओर महागठबंधन में भी उन्हें स्वीकार नहीं किया गया। राजद की ओर से पार्टी का विलय करने को कहा गया, लेकिन वह नहीं माने। अब उनकी नाव बीच मंझधार में फंसी हुई है।
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