
Parliament winter session: पूर्वोत्तर राज्यों के बीच सीमा विवाद अभी सुलझा नहीं था कि अब कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच कुछ क्षेत्रों को लेकर विवाद शुरू हो चुका है। हिंसक होते इस विवाद की गूंज बुधवार को संसद तक पहुंची। एनसीपी नेता सुप्रिया सुले ने लोकसभा के शून्यकाल में इस मुद्दे को उठाते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय के हस्तक्षेप की मांग की है। सुले ने कहा कि महाराष्ट्र को तोड़ने की साजिश की जा रही है। केंद्र इस मामले में हस्तक्षेप करे। हालांकि, शून्यकाल में मुद्दा उठाने पर कर्नाटक के सांसदों ने विरोध करते हुए बताया कि मामला कोर्ट में विचाराधीन है।
एनसीपी सांसदों ने किया वॉकआउट
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की नेता सुप्रिया सुले ने महाराष्ट्र व कर्नाटक सीमा विवाद का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया कि महाराष्ट्र को तोड़ने की साजिश की जा रही है। दोनों राज्यों में बीजेपी की सरकार होने के बावजूद महाराष्ट्र राज्य के लोगों को रोज पीटा जा रहा है। पिछले दस दिनों से महाराष्ट्र को तोड़ने की साजिश रची जा रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस मामले में हस्तक्षेप करें और महाराष्ट्र के साथ इंसाफ हो। सुप्रिया सुले ने कहा कि महाराष्ट्र के लोगों के साथ कर्नाटक सरकार की शह पर अनुचित व्यवहार किया जा रहा है। सुले के प्रश्न उठाने पर कर्नाटक के बीजेपी सांसदों ने आपत्ति जताते हुए यह कहा कि मामला कोर्ट में विचाराधीन है। हालांकि, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि यह बेहद संवेदनशील मामला है और दो राज्यों के बीच का मामला है। स्पीकर के आगे चर्चा न कराने पर एनसीपी सांसदों ने विरोध दर्ज कराते हुए सदन से वॉकआउट कर लिया।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, महाराष्ट्र और कर्नाटक एक दूसरे के कुछ गांवों को अपना बताते हुए दावा कर रहे हैं। 1957 में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बाद यह मुद्दा अब कई दशक बाद हिंसक मोड़ ले रहा है7 महाराष्ट्र ने मराठा भाषी क्षेत्र बेलगावी, जोकि कर्नाटक में है, पर अपना दावा किया है। बेलगावी, तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी का हिस्सा था, यहां मराठी बोलने वाली आबादी की बहुलता है। महाराष्ट्र ने 814 मराठी भाषी गांवों पर अपना दावा किया है जो अभी दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक में है। उधर, कर्नाटक ने भी महाराष्ट्र के कई गांवों पर अपना अधिकार बताते हुए दावा किया है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। हालांकि, राज्य पुनर्गठन अधिनियम और 1967 महाजन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भाषाई आधार पर किए गए सीमांकन को अंतिम माना जाता रहा है।
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