
नई दिल्ली। 9 साल पहले आज के दिन ही निर्भया कांड (Nirbhaya Case) के रूप में देश की राजधानी दिल्ली (Delhi) के चेहरे पर वो बदनुमा दाग लगा था, जिसे मिटा पाना संभव नहीं। चलती बस में पांच बालिग और एक नाबालिग ने 23 साल की निर्भया के साथ हैवानियत का खेल खेला था। इस कांड ने देश को झकझोर दिया था। लोग सड़कों पर उतर आए थे। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कानून सख्त करने की मांग उठी थी। संसद में मामले की गूंज सुनाई दी। इस कांड के बाद रेप की परिभाषा बदली गई। कानून सख्त हुआ। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व चीफ जस्टिस जगदीश शरण वर्मा के सुझावों को मानते हुए सरकार ने आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम 2013 को लागू किया। यह संशोधन अधिनियम 3 फरवरी 2013 से प्रभाव में है।
कानून में हुए बदलाव
नाबालिग आरोपियों के बारे में बदला कानून
निर्भया कांड में शामिल एक दोषी वारदात के वक्त नाबालिग था, जिसके चलते वह मौत की सजा से बच गया। आगे कोई दोषी इस तरह नहीं बच सके इसके लिए कानून बदला गया। 16-18 साल के अपराधियों को भी वयस्क अपराधियों की तरह देखने और सजा देने का फैसला किया गया। दुष्कर्म पीड़िता की मदद के लिए केंद्र सरकार ने 1 हजार करोड़ रुपए से निर्भया फंड की स्थापना की। इस फंड से दुष्कर्म पीड़ितों को राहत पहुंचाई जाती है और उनका पुनर्वास कराया जाता है। 20 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों ने पीड़ित मुआवजा योजना लागू कर दी है। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास के लिए स्वाधार और अल्पावास गृह योजना शुरू की।
निर्भया कांड ने पीड़ितों को न्याय के लिए लड़ने की हिम्मत दी। निर्भया कांड में पीड़ित परिवार ने सामने आकर लोगों से आह्वान किया था कि रेप पीड़ित या यौन उत्पीड़न का शिकार होने वाली महिलाएं अपनी पहचान छिपाने के बदले उनका नाम उजागर करे, जिन्होंने उनके साथ ज्यादती की। इसके बाद कोर्ट में भी माहौल बदला। रेप पीड़िताओं को लेकर संवेदनशीलता बढ़ी।
चलती बस में किया था सामूहिक बलात्कार
बता दें कि 16 दिसंबर 2012 को एक छात्रा के साथ उसके एक मित्र की मौजूदगी में चलती बस में सामूहिक बलात्कार किया गया और उन दोनो को ठिठुरती सर्द रात में बस से बाहर फेंक दिया गया। बाद में इलाज के लिए सिंगापुर ले जाई गई पीड़िता ने वहीं दम तोड़ दिया था। इस मामले की 23 वर्षीय पीड़िता को ‘‘निर्भया'' नाम दिया गया और देश में उसके लिए न्याय की मांग ने आंदोलन का रूप ले लिया। इस मामले में मुकेश सिंह, पवन गुप्ता, विनय शर्मा और अक्षय कुमार सिंह सहित छह व्यक्ति आरोपी बनाए गए। इनमें से एक नाबालिग था। मामले के एक आरोपी राम सिंह ने सुनवाई शुरू होने के बाद तिहाड़ जेल में कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। नाबालिग को सुनवाई के बाद दोषी ठहराया गया और उसे सुधार गृह भेज दिया गया। तीन साल तक सुधार गृह में रहने के बाद उसे 2015 में रिहा कर दिया गया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार 20 मार्च 2020 को इस मामले के चार दोषियों को फांसी दी गई।
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