
प्रिय प्रधानमंत्री मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,
मानव संसाधन विकास मंत्रालय अगर गृह मंत्रालय से अधिक नहीं तो उस जितना ही अहम है।
शिक्षा भारत की आत्मा है। हमारे बच्चों को शिक्षा देने के लिए गलत लोगों को चुनना भी हमारे देश की आत्मा को बेचने के बराबर ही है। शिक्षा विश्व को नया दृष्टिकोण देता है। भारतीय शिक्षा प्रणाली पर औसत दर्जे के शिक्षाविदों का प्रभुत्व है, जो वामपंथी राजनीति में अच्छे हैं, लेकिन रिसर्च, इनोवेशन और क्रिएटिविटी में बदतर हैं। हमने इस मामले को जल्द निपटाने की जरूरत है। हमें शिक्षा पर अपने खर्च को बढ़ाने की जरूरत है। साथ ही इसमें प्रतिभा लाने की भी आवश्यकता है।
आज हम युद्ध की स्थिति में हैं, यह युद्ध हमारी संस्कृति और विरासत के खिलाफ गलत सूचना और प्रचार के खिलाफ है। वहीं, करदाता असहाय रूप नजर आ रहे हैं, आज अलग अलग समूहों से भरे भारत के शिक्षण संस्थान जल रहे हैं। वामपंथी विचारधाराएं निर्दोष युवाओं को भड़का रही हैं।
इसमें एक बात सामान्य है कि हमारी शिक्षा प्रणाली में वामपंथी आधुनिकतावाद का वर्चस्व है। कुछ कट्टरपंथी शिक्षक और प्रोफेसर हमारे युवाओं का 'हिंदुत्व और हिंदुस्तान से अज़ादी' के नाम पर भड़का रहे हैं।
यहां ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां हमारे प्रमुख संस्थानों में कुछ कट्टरपंथी प्रोफेसरों ने अपने छात्र परिषदों की सहमति के बिना नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में बयान जारी कर दिए। यहां छात्रों को चुप रहने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा था। उन्हें यहां भेदभाव का भी सामना करना पड़ा।
सर, एक देश के रूप में, हमने अपने बच्चों का इस्तेमाल ऐसे कैसे होने दिया। हमारे सभी शैक्षणिक और बौद्धिक प्रतिष्ठानों पर वामपंथी वर्चस्व 1950 के दशक से शुरू हुआ, जब गैर-वामपंथी बुद्धिजीवियों सुनियोजित रूप से हटाया गया।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री जगदीश भगवती को दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से हटाना सबसे बड़ा उदाहरण था। यह सफाई इतनी तेजी से की गई कि 1990 के दशक तक संस्थानों में कोई भी गैर वामपंथी बुद्धिजीवी नहीं बचा।
हमारी यूनिवर्सिटियों में होने वाले इस विरोध के सामने हमें इस तरह से घुटने नहीं टेकने चाहिए। इसके बजाय, हमें इस शताब्दियों पुरानी शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए रणनीतिक और व्यवस्थित रूप से काम करना चाहिए। हमें पता है कि इन सबके नतीजे तुरंत नहीं आ सकते।
दुनिया ने हमारे विकास में संस्कृति की भूमिका को समझा और पहचाना है। मई 2013 में चीन में संस्कृति पर हुई यूनेस्को इंटरनेशनल कांग्रेस में यह राय दी गई कि संस्कृति को संयुक्त राष्ट्र विकास के एजेंडे में शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही विरासत, विविधता, रचनात्मकता के प्रसारण पर ध्यान देना चाहिए।
धर्म और संस्कृति का अध्ययन दुनिया के कई देशों में अनिवार्य है। फिनलैंड में स्कूलों और अपर सेकेंडरी स्कूलों दोनों में धार्मिक शिक्षा अनिवार्य विषय है।
जर्मनी में, कैथोलिक या प्रोटेस्टेंट रिलिजियस इंस्ट्रक्शन एक जरूरी विषय है, लेकिन 14 साल की उम्र के बाद छात्र इस विषय को छोड़ सकते हैं। यदि विकसित राष्ट्र अपने धर्म और संस्कृति का सम्मान करना जानते हैं, तो हमें अपनी परंपराओं की उपेक्षा क्यों करनी चाहिए?
भारत में हमेशा से वित्त मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय चार बड़े मंत्रालय रहे हैं। शिक्षा के महत्व को हमेशा नकारा गया। लेकिन अब वक्त बदलाव का है।
अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भी अहम बनाने का वक्त है। प्रधान मंत्री, भारत विचारों का एक खुला बाजार होना चाहिए और वामपंथी इस पर रोक नहीं लगा सकते हैं। हमें शिक्षा को साफ करने की जरूरत है। और हमें इसे अभी करने की आवश्यकता है!
रिगार्ड्स
अभिनव खरे
एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक
कौन हैं अभिनव खरे
अभिनव खरे एशियानेट न्यूज नेटवर्क के सीईओ हैं, वह डेली शो 'डीप डाइव विद अभिनव खरे' के होस्ट भी हैं। इस शो में वह अपने दर्शकों से सीधे रूबरू होते हैं। वह किताबें पढ़ने के शौकीन हैं। उनके पास किताबों और गैजेट्स का एक बड़ा कलेक्शन है। बहुत कम उम्र में दुनिया भर के 100 से भी ज्यादा शहरों की यात्रा कर चुके अभिनव टेक्नोलॉजी की गहरी समझ रखते है। वह टेक इंटरप्रेन्योर हैं लेकिन प्राचीन भारत की नीतियों, टेक्नोलॉजी, अर्थव्यवस्था और फिलॉसफी जैसे विषयों में चर्चा और शोध को लेकर उत्साहित रहते हैं। उन्हें प्राचीन भारत और उसकी नीतियों पर चर्चा करना पसंद है इसलिए वह एशियानेट पर भगवद् गीता के उपदेशों को लेकर एक सफल डेली शो कर चुके हैं।
मलयालम, अंग्रेजी, कन्नड़, तेलुगू, तमिल, बांग्ला और हिंदी भाषाओं में प्रासारित एशियानेट न्यूज नेटवर्क के सीईओ अभिनव ने अपनी पढ़ाई विदेश में की हैं। उन्होंने स्विटजरलैंड के शहर ज्यूरिख सिटी की यूनिवर्सिटी ETH से मास्टर ऑफ साइंस में इंजीनियरिंग की है। इसके अलावा लंदन बिजनेस स्कूल से फाइनेंस में एमबीए (MBA) भी किया है।
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