
Rajiv Gandhi murderers release case: पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या का जुर्म काट रही नलिनी श्रीहरन की समय से पहले रिहाई की याचिका पर सुनवाई 17 अक्टूबर तक टाल दी गई है। उम्रकैद की सजा काट रही नलिनी की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया गया था। न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना की पीठ समय की कमी के कारण मामले की सुनवाई नहीं कर सकी।
क्या कहा तमिलनाडु सरकार ने?
तमिलनाडु सरकार ने शीर्ष अदालत को दो अलग-अलग एफिडेबिट्स में यह बताया कि 9 सितंबर, 2018 को हुई कैबिनेट मीटिंग में राजीव गांधी हत्याकांड के सात दोषियों की दया याचिकाओं पर विचार किया गया था। कैबिनेट ने राज्यपाल को पूर्व पीएम राजीव गांधी के हत्यारों के जीवन की छूट के लिए सिफारिश की थी। संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत सरकार ने अपनी शक्तियों का प्रयोग कर सिफारिश गवर्नर से की थी। संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार कैबिनेट का निर्णय अंतिम है और इसके अनुसार राज्यपाल कैबिनेट की सलाह को मानेंगे। दरसअल,नलिनी, संथान, मुरुगन, एजी पेरारिवलन, रॉबर्ट पायस, जयकुमार और रविचंद्रन आजीवन कारावास की सजा पिछले 23 सालों से जेल में काट रहे हैं।
नलिनी व रविचंद्रन पैरोल पर बाहर
नलिनी और रविचंद्रन दोनों पैरोल पर करीब एक साल से बाहर ही हैं। तमिलनाडु सरकार ने तमिलनाडु सस्पेंडेशन ऑफ सेंटेंस रूल्स 1982 के तहत दोनों के पैरोल को 27 दिसंबर 2021 को मंजूर कर लिया था। नलिनी वेल्लोर की स्पेशल जेल में 30 साल से अधिक समय से सजा काट रही है। जबकि रविचंदद्रन मदुरै सेंट्रल जेल में 37 साल की सजा काट चुका है।
कोर्ट ने केंद्र व तमिलनाडु सरकार से मांगा था जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने 26 सितंबर को श्रीहरन और रविचंद्रन की समय से पहले रिहाई की मांग वाली याचिका पर केंद्र और तमिलनाडु सरकार से जवाब मांगा था। दोनों ने मद्रास उच्च न्यायालय के 17 जून के आदेश को चुनौती दी है। मद्रास हाईकोर्ट ने उनकी जल्द रिहाई के लिए याचिका खारिज कर दी थी क्योंकि राज्य के राज्यपाल की सहमति के बिना भी उनकी रिहाई का आदेश दिया गया था।
21 मई को हुई थी राजीव गांधी की हत्या
देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या एक चुनावी रैली के दौरान हुई थी। 21 मई 1991 की रात में तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में कर दी गई थी। मानव बम से लैस एक आत्मघाती दस्ते ने राजीव गांधी पर हमला कर उनकी हत्या कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने मई 1999 के अपने आदेश में चार दोषियों पेरारिवलन, मुरुगन, संथान और नलिनी की मौत की सजा को बरकरार रखा था। हालांकि, कोर्ट ने 2014 में इनकी दया याचिकाओं पर फैसला लेने में देरी के आधार पर संस्थान व मुरुगन के साथ पेरारीवलन की सजा-ए-मौत को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया था। 2001 में चौथी हत्यारिन नलिनी की भी दया याचिका पर सुनवाई हुई और सजा-ए-मौत को उम्रकैद में बदल दिया गया। नलिनी की छोटी बेटी होने की वजह से उसकी सजा कम की गई थी।
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