
श्रावण मास का आगमन होते ही देशभर में त्योहारों का रंग चढ़ने लगता है। यह समय खुशियों, उल्लास, प्रेम, और भाईचारे का होता है। साल भर की भागमभाग और तनावों से भरे जीवन में ये त्योहार मन को सुकून और शांति प्रदान करते हैं। भारत में, रक्षाबंधन भाई और बहन के बीच के अटूट बंधन को मजबूत करने वाला एक विशेष त्योहार है। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्योहार यजुर्वेद उपाकर्म, नारियल पूर्णिमा और रक्षाबंधन जैसे कई नामों से जाना जाता है। इस दिन, बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं, आरती उतारती हैं और उनसे आशीर्वाद लेती हैं। यह त्योहार भाई-बहन के बीच आपसी प्रेम और रक्षा के वचन का प्रतीक है। इसलिए, आज के दिन भाई-बहन चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हों, इस खास मौके पर एक-दूसरे के पास आते हैं और प्यार और स्नेह से सराबोर हो जाते हैं। यह पवित्र दिन नारियल पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है। यही कारण है कि हमारे साहित्यकारों ने 'रक्षाबंधन रक्षा का प्रतीक हमारे देश का, भाई-बहन के प्रेम का स्पंदन धागे का' गाकर इस दिन की महिमा का बखान किया है।
रक्षाबंधन का महत्व: प्राचीन काल से ही भारत में नारियल पूर्णिमा मनाई जाती रही है, इसके कई उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं। भाई-बहन के बीच प्रेम और एकता का प्रतीक इस त्योहार को हिंदू धर्म में विशेष महत्व दिया गया है। नारी को माँ का रूप मानकर उसकी पूजा करने वाली महान संस्कृति हमारी है। उस माँ की रक्षा का भार इस धरती पर जन्मे हर भाई का है, यह संदेश रक्षाबंधन का त्योहार बार-बार समाज को देता है।
इस लिहाज से नारियल पूर्णिमा का त्योहार बेहद खास हो जाता है। बांधा जाने वाला धागा भले ही छोटा हो, लेकिन जब उसे भावनाओं का स्पर्श मिलता है तो उसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। कितना भी कठोर हृदय क्यों न हो, पल भर में पिघलकर पानी हो जाता है। असंभव भी संभव हो जाता है। यह शरीर की रक्षा करने वाली शक्ति है। रक्षाबंधन का मतलब सिर्फ केसरिया धागा बांधकर, उपहार देकर खुशियां मनाना नहीं है, बल्कि यह तो प्रेम और ममता से भरकर, जब तक मैं जीवित हूं, मेरे भाई को खुश रहना चाहिए, उसकी रक्षा करनी चाहिए, ऐसी पवित्र भावना से की गई बहन की प्रार्थना है।
महाभारत का संदर्भ: हिंदू संस्कृति में बिना किसी पौराणिक संदर्भ के कोई भी त्योहार नहीं मनाया जाता है। रक्षाबंधन भी इससे अछूता नहीं है। रक्षाबंधन को महाभारत की इस घटना से बल मिलता है। कहते हैं कि जब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र धारण किया था, तब उनके हाथ से रक्त बहने लगा था। तब वहां मौजूद उनकी बहन द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर कृष्ण के हाथ में बांध दिया था। बहन द्रौपदी की इस भावना से प्रसन्न होकर कृष्ण ने उन्हें हर संकट से बचाने का वचन दिया था। आगे चलकर द्युत सभा में जब द्रौपदी का चीरहरण किया जा रहा था, तब स्वयं भगवान कृष्ण ने आकर द्रौपदी को अक्षय वस्त्र प्रदान कर उनकी लाज बचाई थी। उस दिन द्रौपदी की रक्षा करने वाला और कोई नहीं बल्कि कृष्ण के हाथ में बंधा हुआ वह छोटा सा 'धागा' ही था! यह बात यहां ध्यान देने योग्य है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ। युद्ध में हारकर देवता स्वर्ग से निकाल दिए गए। रोजाना होने वाले यज्ञ आदि बंद हो गए। चिंतित इंद्र ने बृहस्पति से प्रार्थना की। बृहस्पति ने उन्हें दोबारा विजय प्राप्त करने के लिए श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा विधान करने को कहा। गुरुओं के आदेश पर इंद्राणी शचीदेवी ने बृहस्पति से इंद्र का श्रावण पूर्णिमा के दिन स्वस्तिवाचन करवाया और उनसे रक्षा सूत्र प्राप्त कर इंद्र के दाहिने हाथ में बांधा। कहते हैं कि तब इंद्र ने असुरों को पराजित कर स्वर्ग पर दोबारा अधिकार कर लिया था। भविष्य पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। साथ ही, इसी दिन भगवान विष्णु ने राजा बलि से रक्षाबंधन करवाकर दक्षिणा मांगी थी, ऐसा पुराणों में वर्णित है।
शुरुआत में रक्षाबंधन मुख्य रूप से उत्तर भारत में धूमधाम से मनाया जाता था, लेकिन धीरे-धीरे यह त्योहार पूरे भारत में मनाया जाने लगा। खासकर उत्तर कर्नाटक में इस त्योहार की रौनक देखते ही बनती है। घर में तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं, दूर-दराज से भाई को घर बुलाया जाता है, उसकी आरती उतारकर राखी बांधी जाती है, मिठाई खिलाकर खुशियां मनाई जाती हैं। अगर घर में एक ही बेटी हो तो रिश्तेदारों को बुलाकर बेटी से राखी बंधवाई जाती है। इस तरह एक छोटा सा धागा समाज में कई दिलों को जोड़ता है, रिश्तों को मजबूत करता है और समाज में प्रेम और सद्भाव बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस लिहाज से रक्षाबंधन का त्योहार वाकई खास है।
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