
करियर डेक्स : हैदराबाद में 11वीं सदी के समाज सुधारक और संत रामानुजाचार्य (Saint Ramanujacharya) की 216 फुट ऊंची प्रतिमा स्टेच्यू ऑफ इक्वेलिटी (Statue of Equality) बन कर तैयार हो गई है। इस प्रतिमा का आज पीएम मोदी अनावरण करेंगे। इस प्रतिमा की लागत 1000 करोड़ बताई जा रही है, बैठने की स्थिति में यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मूर्ति है। मूर्ति शहर के बाहरी इलाके में 45 एकड़ के परिसर में स्थित है। श्री रामानुजाचार्य का आंतरिक गर्भगृह 120 किलो सोने से बना है। इसे संत द्वारा पृथ्वी पर बिताए गए 120 वर्षों की स्मृति में बनाया गया है। आइए जानते हैं कि देश दुनिया को समानत का पाठ पढ़ाने वाले संत रामानुजाचार्य के बारे में।।।
रामानुजाचार्य की शिक्षाओं का केंद्र बना तेलंगाना -के चंद्रशेखर राव
तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने संत रामानुजाचार्य की मुर्ति की हैदराबाद में स्थापित होने प्रसन्नता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि यह तेलंगाना के लिए गर्व का क्षण है कि तेलंगाना में हजारों वर्षों के बाद श्री रामानुजाचार्य की मुर्ति स्थापित हो रही है, उन्होंने कहा कि श्री रामानुजाचार्य ने दुनियाभर में दुनियाभर को समाजिक समानता का पाठ पढ़ाया। राव ने कहा कि तेलंगाना अब श्री रामानुजाचार्य की शिक्षाओं का केंद्र बन गया है।
कौन थे संत रामानुजाचार्य?
वैष्णव संत रामानुजाचार्य का जन्म सन 1017 में तमिलनाड़ु में हुआ था। उन्होंने कांची में अलवार यमुनाचार्य से दीक्षा ली थी। श्रीरंगम के यतिराज नाम के संन्यासी से उन्होंने संन्यास की दीक्षा ली। उन्होंने समानता और सामाजिक न्याय की वकालत पूरे भारत का भ्रमण किया और वेदांत और वैष्णव धर्म का प्रचार किया। उन्होंने कई संस्कृत ग्रंथों की भी रचना की। उसमें से श्रीभाष्यम् और वेदांत संग्रह उनके सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ रहे। 120 वर्ष की आयु में 1137 में उन्होंने देहत्याग किया। रामानुजाचार्य पहले संत थे, जिन्होंने भक्ति, ध्यान और वेदांत को जाति बंधनों से दूर रखने की बात की। धर्म, मोक्ष और जीवन में समानता की पहली बात करने वाले भी संत रामानुजाचार्य ही थे। रामानुजाचार्य को अन्नामाचार्य, रामदास, कबीर दास और मीराबाई जैसे कवियों के लिए प्रेरणा माना जाता है।
भगवान की कृपा के सभी पात्र
संत रामानुजाचार्य ने लोगों को सिखाया कि मोक्ष प्राप्त करने का सबसे अच्छा साधन विष्णु की गहन भक्ति है। उन्होंने लोगों को सिखाया कि लोगों को बताया कि कोई भी चाहे किसी भी समुदाय का हो, वह भगवान की कृपा का पात्र है, अगर वह पूरी लगन के साथ अपने आप को भगवान को समर्पित करता हैं और भगवान की कृपा ऐसे लोगों पर ही बरसती है।
ये 3 काम करने के लिया था संकल्प
गुरु की इच्छानुसार रामानुजाचार्य ने तीन विशेष काम करने का संकल्प लिया था - ब्रह्मसूत्र, विष्णु सहस्रनाम और दिव्य प्रबन्धम् की टीका लिखना। मैसूर के श्रीरंगम् से चलकर रामानुज शालिग्राम नामक स्थान पर रहने लगे। रामानुज ने उस क्षेत्र में बारह वर्ष तक वैष्णव धर्म का प्रचार किया। उसके बाद तो उन्होंने वैष्णव धर्म के प्रचार के लिये पूरे भारतवर्ष का ही भ्रमण किया। वैष्णव आचार्यों में प्रमुख रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में ही रामानन्द हुए, जिनके शिष्य कबीर, रैदास और सूरदास थे। रामानुज ने वेदान्त दर्शन पर आधारित अपना नया दर्शन विशिष्ट अद्वैत वेदान्त लिखा था।
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