
मेघनगर, मध्य प्रदेश. बुजुर्गों के लिए अकेले यात्रा कभी-कभार एक गलती से कैसे मौत का कारण बन जाती है, यह सच्ची घटना इसी को लेकर अलर्ट करती है। दिल दहलाने वाली घटना मध्य प्रदेश के मेघनगर के करीब एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी के साथ घटी। माना जा रहा है कि वे तम्बाकू थूकने ट्रेन के गेट पर आए और खंभे से टकरा गए। यह हादसा झाबुआ जिले के मेघनगर में रहने वाले राजेंद्र श्रीवास्तव नीरज ने अपने facebook वॉल पर शेयर किया है। वे मानसिक विक्षप्त,भटके बिछड़े को उनके परिजनों से मिलाने वाली स्वयंसेवी संस्था(NGO) चलाते हैं। इस पोस्ट को शेयर करने का मकसद लोगों को सचेत करना है, ताकि वे अपने बुजुर्गों को अकेले यात्रा पर न जानें दें। अगर जाना जरूरी है, तो उनकी सुरक्षा को लेकर संभावित उपाय करें। पढ़िए दिल दहलाने वाली एक सच्ची घटना...
किसे पता था कि ये अंतिम यात्रा साबित होगी
यह हादसा साबरमती ट्रेन से अचानक गायब हुए रिटायर्ड पुलिस अधिकारी विक्रमादित्य वर्मा के साथ घटी। राजेंद्र श्रीवास्तव की जुबानी...
पता नहीं क्यों...लिख पाने में असमर्थता सी लग रही है। व्यथित मन हिम्मत नही जुटा पा रहा। हादसा ही इतना हृदयविदारक था। शायद जो लिख रहा हूं, ताकि आगे से किसी अन्य के साथ ऐसी घटना न घटित हो।सतर्कता-सावधानी बरती जाए। एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी जो उम्र के इस पड़ाव में भी पूर्ण रूप से फिट था। अकेले ही हजार किलोमीटर सफर करने में कोई दिक्कत नही होती थी। पुलिस की नौकरी में रहकर कई राज्यों में भ्रमण करने का एक लंबा अनुभव था।
विक्रमादित्य वर्मा मूल रूप से उत्तरप्रदेश के रहने वाले थे। वे गुजरात आकर बस गए थे। यहां उनकी पुलिस में सर्विस लग गई थी। अनुशासन भरा जीवन रहा, दो पुत्र हैं, एक पुत्र डॉक्टर MD तथा एक विजिलेंस पुलिस सब इंस्पेक्टर। रिटायर्ड होने के बाद विक्रमादित्य वर्मा अकेले उत्तरप्रदेश के अकबरपुर में अपने गांव आते-जाते रहते थे। 15 मई को वे अकबरपुर से अहमदाबाद वापसी के लिए साबरमती ट्रेन में द्वितीय वातानुकूलित(second air-conditioned) आरक्षित सीट पर सवार होकर यात्रा शुरू करते हैं। लेकिन किसी को नहीं पता था कि ये उनका अंतिम सफर होगा।
जैसा विक्रमादित्य ने हादसे के पहले तक अपनी फैमिली को फोन पर बताया
ट्रेन अपने निर्धारित समय से निकली थी। मप्र के रतलाम पहुंचने पर वो समय से करीब दो घंटे विलम्ब से हो चुकी थी। यहां ट्रेन 10 मिनिट रुकती है। सो विक्रमादित्य वर्मा स्टेशन पर उतरे और भोजन पैकेट लिया। कुछ देर बाद ट्रेन चली। विक्रमादित्य वर्मा ने भोजन किया। बेसिन तक जाकर अपनी प्लेट साफ की और फिर सीट पर आकर बैठ गए। विक्रमादित्य वर्मा तम्बाकू का सेवन करते थे। आशंका है कि भोजन के बाद उन्होंने तम्बाकू खाई। इस बीच ट्रेन मेघनगर स्टेशन पर 21:55 पर पहुंची। 2 मिनिट स्टॉप के बाद चल दी। मेघनगर से करीब तीन या चार किलोमीटर बाद या तो वो तम्बाकू थूकने गए या गेट पर से बाहर झांके होंगे, तभी हादसा हुआ। वे खंभे से टकराए। घटनास्थल पर उनका मोबाइल और अन्य सामान पड़ा मिला।
जब स्टेशन पर नहीं उतरे पिता, तब बेटों को फिक्र हुई
अहमदाबाद में विक्रमादित्य के बेटे उनका इंतजार कर रहे थे। ट्रेन पहुंचने पर जब वे स्टेशन पर नहीं उतरे, तब उनके बेटे फिक्रमंद हुए और संबंधित कोच की सीट तक गए। सारा लगेज जैसे-चप्पल, झोला, चश्मा सीट पर रखा हुआ था, लेकिन वे कहीं नहीं दिखे। बेटों ने अन्य यात्रियों से पूछताछ की। थोड़ी-बहुत जानकारी मिली, लेकिन उनके साथ क्या हुआ, कोई नहीं बता सका। इस बीच ट्रेन आगे बढ़ गई।
पुलिस ने शुरू की खोजबीन
बेटों की शिकायत के बाद पुलिस ने भी विक्रमादित्य की खोजबीन शुरू की। बेटों ने मोबाइल पर कॉल किया। बेल(bell) बजती रही, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया। लोकेशन सर्च में मोबाइल टावर की लास्ट लोकेशन मेघनगर के पास होना पाया गया। बेटे तुरंत वहां के लिए निकले। सुबह करीब 4:40 पर मेरे नम्बर(राजेंद्र श्रीवास्तव नीरज) पर कॉल आई-नीरज भाई बोल रहे हो क्या? मैंने कहा जी, बताएं क्या बात है? इसके बाद सारा घटनाक्रम जानने के बाद मैं भी खोजबीन में जुट गया। शुरुआत में दोनों प्लेटफॉर्म, फिर पूरा गांव, गली-गली छान डाली, कोई पता नही चला। फिर मोबाइल लोकेशन के आधार पर पटरी के पास-पास जाने का तय किया। शाम को GRP थाने में गुमशुदगी दर्ज हुई। अगले दिन अल सबेरे 5 बजे से फिर खोजबीन शुरू हुई। cctv कैमरे जाचें। तभी RPF के स्टाफ को किसी राहगीर ने सूचना दी कि पोल नम्बर 571/15 के पास अज्ञात डेथ बॉडी पड़ी है। बिजली का पोल खून से सना था। पास ही विक्रमादित्य वर्मा की नकली बत्तीसी, घड़ी और कीपैड वाला मोबाइल बिखरा पड़ा था।
सबको यह सलाह
इस केस से हमें कई बातें सीखने को मिलीं। पहली और सबसे महत्वपूर्ण कि हम अपने परिवार के ऐसे जनों का, जिनकी उम्र 60 के पार है, उन्हें अकेले न छोड़ें। उनके जो भी कार्य हैं हम उनके साथ मिलकर करें।,सफर में तो बिलकुल भी अकेले यात्रा न करने दें। आम न जो रेल में यात्रा करते है, दरवाजों पर खड़े न रहें व बाहर गर्दन निकाल कर तो बिलकुल भी न झांके। (राजेंद्र श्रीवास्तव नीरज की पोस्ट को कुछ संपादित करके प्रकाशित किया गया है)
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