
साँप का नाम सुनते ही डर लगना स्वाभाविक है. लेकिन क्या साँपों के डर से घर में ही रहना पड़ेगा? पश्चिम बंगाल के एक गाँव के लोगों की यही हालत हो गई है. साँपों के डर से वे घर में ही रहने को मजबूर हैं. शाम होते ही गाँव के लोग घर से बाहर नहीं निकलते. उन्हें नहीं पता कि कब, कहाँ से साँप हमला कर दे. अब तक 20-25 लोग साँपों का शिकार हो चुके हैं. साँपों के डर से लोग अपने रोजमर्रा के काम भी ठीक से नहीं कर पा रहे हैं. साँपों ने उनकी चैन छीन ली है. साँपों का यह आशियाना पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना के कचुआ ग्राम पंचायत के गोबिला गाँव में है. यहाँ एक या दो साँप नहीं, बल्कि साँपों की पूरी फ़ौज है.
पिछले साल बारिश के बाद यहाँ के हालात बदल गए. पहले साँपों की संख्या बहुत कम थी. लेकिन बारिश खत्म होते ही साँपों ने गोबिला को अपना घर बना लिया. अब तक तीन लोगों की मौत साँप के काटने से हो चुकी है. 20-25 लोग साँपों का शिकार हो चुके हैं. यहाँ के लोग अंधविश्वास में बहुत यकीन रखते हैं. साँप काटने पर डॉक्टर के पास जाने के बजाय, झाड़-फूंक कराने वालों की संख्या ज्यादा है. इसलिए स्थानीय अधिकारी लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं. उन्हें वन विभाग के साथ लगातार संपर्क में रहने के निर्देश दिए गए हैं.
अब तक कई साँपों को पकड़कर जंगल में छोड़ दिया गया है. रात में ठीक से रोशनी न होने के कारण, साँप कहाँ है, यह पता नहीं चलता. इससे जान को खतरा बना रहता है. ग्रामीणों ने स्ट्रीट लाइट लगाने और ज्यादा से ज्यादा साँप पकड़ने की मांग की है. ग्रामीणों की मांग पर पंचायत ने ध्यान दिया है. स्ट्रीट लाइट लग रही हैं. साथ ही, लोगों को इलाज के बारे में जानकारी दी जा रही है. पंचायत अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि कुछ ही दिनों में ग्रामीणों को साँपों से निजात मिल जाएगी और वे चैन की जिंदगी जी सकेंगे.
साँप काटने से इतनी मौतें : ग्रामीण भारत में हर साल सैकड़ों लोग साँप काटने से मर जाते हैं. इसे एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या माना जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया भर में हर साल लगभग 25 लाख से ज्यादा लोग जहरीले साँप के काटने का शिकार होते हैं. भारत में हर साल 10 हजार मौतें साँप काटने से होती हैं. एशिया में हर साल लगभग 40 लाख मामले और 100,000 मौतें होती हैं. पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले में जनवरी 2006 से दिसंबर 2008 तक तीन साल की अवधि में साँप काटने से 86 लोगों की मौत हुई थी. मरने वालों में पुरुषों की संख्या ज्यादा थी, बारिश के मौसम और दिन में घटनाएं ज्यादा होती हैं.
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