
Supreme Court big verdict on AMU minority status: क्या अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) एक अल्पसंख्यक संस्थान है? क्या एएमयू को संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त है जो धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार देता है? भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 7 जजों की संविधान पीठ ने शुक्रवार को इस पर फैसला सुनाया।
सात जजों वाली बेंच में जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जेबी पारदीवाला, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा शामिल हैं। बेंच ने आठ दिनों तक दलीलें सुनने के बाद 1 फरवरी को इस सवाल पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा बरकरार रहेगा। आर्टिकल 30 का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक समुदाय शिक्षा संस्थान बना और चला सकते हैं। एपेक्स कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह से पलट दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय मुद्दे पर फैसला स्थगित करते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थान के अल्पसंख्यक दर्जे को रद्द करने संबंधी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2006 के आदेश पर निर्णय के लिए एक अन्य पीठ का गठन किया जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि नई बेंच में तीन जज शामिल होंगे। बेंच इस फैक्ट की जांच करेगी कि क्या अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक समाज के लोगों ने स्थापित किया था।
सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने शुक्रवार को एएमयू पर 1967 में आए एक महत्वपूर्ण फैसला को 4:3 की बहुमत से पलट दिया। कई दशक पुराने फैसले में विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त कर दिया गया था। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने पहले के उस फैसले को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि किसी कानून द्वारा गठित संस्थान अल्पसंख्यक दर्जे का दावा नहीं कर सकता लेकिन एएमयू से संबंधित सवाल को नियमित पीठ पर छोड़ दिया। संविधान पीठ में तीन असहमत जजों में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा थे जबकि तीन अन्य जस्टिस संजीव खन्ना (जो अगले मुख्य न्यायाधीश होंगे), जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा, साथ ही निवर्तमान सीजेआई के पास बहुमत था।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना 1875 में मुहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज के रूप में सर सैयद अहमद खान की अगुवाई में मुस्लिम समुदाय के सदस्यों ने किया था। 1920 में इसे ब्रिटिश राज में विश्वविद्यालय में बदल दिया गया।
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