
Supreme Court Collegium: देश में करोड़ों केसों की पेंडेंसी के लिए केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को दोषी ठहराया है। सर्वोच्च न्यायालय को एक बार फिर आड़े हाथों लेते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जजों की नियुक्ति में सरकार की बहुत ही सीमित भूमिका है। बहुत सारे पद खाली हैं जिसकी वजह से मुकदमों का निस्तारण समय से नहीं हो पा रहा है। लंबित केसों की संख्या बढ़ती जा रही है, चाहकर भी सरकार जजों को नियुक्त नहीं कर पा रही है। रिजिजू ने कहा कि कॉलेजियम जजों की नियुक्ति में संसद और लोगों की भावनाओं का ख्याल नहीं रहा है।
किरेन रिजिजू, गुरुवार को बड़ी संख्या में लंबित मामलों पर संसद में एक सवाल का जवाब दे रहे थे। जवाब के दौरान उन्होंने न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि यह चिंताजनक है कि देश भर में पांच करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। इन मामलों के लंबित होने की वजह जजों की नियुक्ति में देरी है। सरकार चाहती है कि जजों की नियुक्ति हो लेकिन इस नियुक्ति में सरकार के अधिकार व भूमिका सीमित है। कॉलेजियम की वजह से देश में मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है। संसद को उन्होंने साफ तौर पर सूचना दी कि सरकार ने लंबित केसों को कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं लेकिन न्यायाधीशों की वैकेंसी को भरने में सरकार की भूमिका सीमित है। कॉलेजियम नामों का चयन करता है। सरकार के पास इन नियुक्तियों का कोई अधिकार नहीं है।
कॉलेजियम के सुझाए नाम भारत की विविधता के खिलाफ
केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार ने अक्सर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और हाईकोर्ट्स के चीफ जस्टिस्ट्स से यह कहा कि वह ऐसे जजों के नामों को भेजे जो क्वालिटी और देश की विविधता को दर्शाते हों लेकिन ऐसा नहीं होता। महिला जजों की को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है। लेकिन कॉलेजियम ने मौजूदा व्यवस्था में संसद या लोगों की भावनाओं को ध्यान में नहीं रखा है।
संविधान के विपरीत है कॉलेजियम
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देश में यह लग रहा है कि सरकार न्यायपालिका में हस्तक्षेप कर रही है। लेकिन संविधान की भावनाओं का ख्याल रखने के लिए ऐसा किया जा रहा है। संविधान के अनुसार जजों की नियुक्ति में सरकार का पूरा अधिकार है। लेकिन 1993 के बाद पूरा सिस्टम बदल दिया गया और कॉलेजियम लागू कर दिया गया। इससे सरकार की भूमिका सीमित हो गई। रिजिजू ने संसद को जबतक जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव नहीं होता, जजों की नियुक्तियों का मामला ऐसी उठता रहेगा और समस्या बनी रहेगी। श्री रिजिजू ने 2014 में लाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम का भी उल्लेख किया जिसे 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था।
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