
RH Isoimmunization Case AIIMS Gorakhpur: पूर्वांचल के स्वास्थ्य क्षेत्र से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की ताकत और डॉक्टरों की सूझबूझ दोनों को नई पहचान दी है। AIIMS Gorakhpur के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग ने एक बेहद जटिल और दुर्लभ चिकित्सा प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम देकर मां के गर्भ में पल रहे शिशु की जान बचा ली। यह उपलब्धि इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि अब तक इस तरह के इलाज के लिए मरीजों को दिल्ली, मुंबई या दूसरे बड़े महानगरों का रुख करना पड़ता था।
11 मई 2026 को की गई इस प्रक्रिया के बाद मां और शिशु दोनों पूरी तरह स्वस्थ बताए जा रहे हैं। डॉक्टरों के मुताबिक यह मामला केवल एक मेडिकल सफलता नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए उम्मीद की नई किरण है, जो बार-बार गर्भ में शिशु खोने की पीड़ा झेल चुके हैं।
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एम्स गोरखपुर की मीडिया प्रभारी डॉ. आराधना सिंह के अनुसार, कुशीनगर की रहने वाली एक गर्भवती महिला इलाज के लिए अस्पताल पहुंची थीं। महिला की पिछली गर्भावस्थाओं में गंभीर जटिलता RH Isoimmunization के कारण गर्भ में ही शिशुओं की मौत हो चुकी थी। लगातार चार बार मातृत्व खोने का दर्द झेल चुकी यह महिला पांचवीं बार गर्भवती हुई थीं और इस बार भी खतरा बेहद बड़ा था। डॉक्टरों ने महिला की एंटीनैटल ओपीडी में विस्तृत जांच की। इस दौरान उनका Indirect Coombs Test पॉजिटिव पाया गया, जिसके बाद विशेषज्ञों ने गर्भस्थ शिशु की लगातार डॉप्लर अल्ट्रासाउंड निगरानी शुरू की।
निगरानी के दौरान डॉक्टरों को पता चला कि गर्भ में पल रहा शिशु गंभीर एनीमिया से जूझ रहा है। खून की कमी इतनी बढ़ चुकी थी कि शिशु के हृदय के फेल होने और गर्भ में ही मृत्यु का खतरा पैदा हो गया था। डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि शिशु का इलाज जन्म से पहले ही करना जरूरी था। ऐसे में मेडिकल टीम ने Intrauterine Blood Transfusion यानी गर्भ के भीतर ही शिशु को खून चढ़ाने का फैसला लिया।
यह प्रक्रिया बेहद संवेदनशील और उच्च विशेषज्ञता वाली मानी जाती है। इसमें अल्ट्रासाउंड की मदद से गर्भ में पल रहे शिशु की नाल तक पहुंचा जाता है और फिर सीधे शिशु को रक्त चढ़ाया जाता है। इस जटिल प्रक्रिया को मातृ एवं भ्रूण चिकित्सा की नोडल अधिकारी और स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रीति बाला सिंह ने सफलतापूर्वक अंजाम दिया। पूरी प्रक्रिया के दौरान विशेषज्ञों की टीम लगातार शिशु की धड़कन, रक्त प्रवाह और मां की स्थिति पर नजर बनाए हुए थी। डॉक्टरों का कहना है कि समय रहते सही निर्णय और टीमवर्क की वजह से शिशु की जान बचाई जा सकी।
RH Isoimmunization एक गंभीर मेडिकल स्थिति है, जिसमें मां और शिशु के रक्त समूह के बीच असंगति होने पर मां के शरीर में बनने वाली एंटीबॉडी शिशु की लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला करने लगती हैं। इससे गर्भस्थ शिशु में गंभीर एनीमिया, हार्ट फेलियर और कई मामलों में गर्भ में ही मौत तक हो सकती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि समय पर जांच और निगरानी से इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के सीमावर्ती इलाकों में हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के मामलों में अब तक मरीजों को बड़े शहरों में रेफर किया जाता था। लेकिन AIIMS गोरखपुर में इस तरह की अत्याधुनिक प्रक्रिया सफल होने के बाद क्षेत्र के हजारों परिवारों को स्थानीय स्तर पर बेहतर इलाज मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इससे हाई रिस्क प्रेग्नेंसी मैनेजमेंट में क्षेत्रीय चिकित्सा सेवाओं को नई मजबूती मिलेगी।
संस्थान की निदेशक डॉ. विभा दत्ता ने इस उपलब्धि पर प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग, फीटल मेडिसिन टीम, ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग, रेजिडेंट डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि संस्थान के लिए गर्व का विषय है और इससे यह साबित होता है कि AIIMS गोरखपुर अब जटिल से जटिल चिकित्सा प्रक्रियाओं को सफलतापूर्वक करने में सक्षम है।
एक मां, जिसने कई बार गर्भ में अपने बच्चों को खोया… एक शिशु, जिसकी जिंदगी जन्म से पहले ही खतरे में थी… और डॉक्टरों की एक टीम, जिसने हार नहीं मानी। AIIMS गोरखपुर की यह सफलता सिर्फ एक मेडिकल केस नहीं, बल्कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और मानवीय संवेदनाओं की ऐसी कहानी है, जो हजारों परिवारों में उम्मीद जगा सकती है।
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