अखिलेश के सामने भिड़े सपा के दो नेता, एक घंटे बाद ही हुआ बड़ा एक्शन; एटा-कासगंज में क्या बदला?

Published : Sep 21, 2026, 03:44 PM IST
Akhilesh Yadav Dissolves SP Units in Etah Kasganj After Leaders Clash What Triggered the Big Action

सार

एटा-कासगंज में सपा की पूरी जिला कार्यकारिणी भंग होने के बाद यूपी की सियासत गरमा गई है। अखिलेश यादव के सामने विवाद और पुराने राजनीतिक समीकरणों ने 2027 से पहले कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच समाजवादी पार्टी ने एटा और कासगंज में ऐसा फैसला लिया है, जिसने स्थानीय सियासत के पुराने समीकरणों को फिर चर्चा में ला दिया है। 19 सितंबर को लखनऊ में हुई संगठनात्मक बैठक में नेताओं के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि मामला तीखी बहस और कथित गाली-गलौज तक पहुंच गया।

इसके बाद दोनों जिलों की जिला कार्यकारिणी और फ्रंटल संगठनों को भंग कर दिया गया। लेकिन सवाल सिर्फ बैठक में हुए विवाद का नहीं है। एटा की राजनीति में लंबे समय से चले आ रहे स्थानीय समीकरण, नेताओं के बीच मतभेद और पिछले विधानसभा चुनावों का प्रदर्शन भी इस घटनाक्रम को समझने के लिए अहम हैं।

अखिलेश के सामने क्या हुआ?

लखनऊ स्थित सपा मुख्यालय में एटा-कासगंज के करीब 250 नेताओं और पदाधिकारियों के साथ बैठक 2027 की तैयारियों और संगठन की जमीनी स्थिति पर चर्चा के लिए बुलाई गई थी। इसी दौरान पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष जुगेंद्र सिंह यादव और सपा नेता मंजीत यादव के बीच किसी मुद्दे को लेकर बहस शुरू हुई। रिपोर्टों के मुताबिक, बात बढ़ने पर दोनों पक्षों के बीच कथित तौर पर गाली-गलौज तक हो गई।

माहौल बिगड़ने के बाद अखिलेश यादव बैठक से बाहर चले गए। इसके करीब एक घंटे के भीतर एटा और कासगंज की जिला इकाइयों को भंग करने का फैसला सामने आया।

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सिर्फ विवाद नहीं, पुरानी गुटबाजी भी चर्चा में

एटा में जुगेंद्र सिंह यादव और उनके परिवार का लंबे समय से स्थानीय राजनीति में प्रभाव रहा है। जुगेंद्र यादव पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके हैं और पूर्व विधायक रामेश्वर सिंह यादव के भाई हैं। दूसरी तरफ मंजीत यादव का संबंध पूर्व विधान परिषद सभापति रमेश यादव के परिवार से है। मंजीत जिला पंचायत की राजनीति से भी जुड़े रहे हैं।

यही वजह है कि ताजा विवाद को स्थानीय राजनीतिक वर्चस्व की पुरानी खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, गुटबाजी को कार्रवाई की एकमात्र वजह बताना अभी उचित नहीं होगा। पार्टी की तत्काल कार्रवाई का प्रत्यक्ष संदर्भ बैठक में हुआ अनुशासन संबंधी विवाद ही है।

एटा-कासगंज में चुनावी प्रदर्शन भी बड़ा सवाल

दोनों जिलों में सपा के हालिया चुनावी प्रदर्शन ने भी संगठन के सामने चुनौती खड़ी की है। 2022 के विधानसभा चुनाव में एटा और कासगंज की कुल सात सीटों में सपा सिर्फ पटियाली सीट जीत सकी थी, जबकि बाकी छह सीटें भाजपा के खाते में गईं। 2017 में भी सपा को इन सातों सीटों पर हार मिली थी। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 से पहले पार्टी सिर्फ संगठन नहीं, बल्कि स्थानीय चुनावी नेटवर्क को भी दोबारा व्यवस्थित करने की कोशिश कर रही है।

अब किसके हाथ जाएगी संगठन की कमान?

सपा ने एटा-कासगंज में जिलाध्यक्षों के साथ जिला कार्यकारिणी और फ्रंटल संगठनों के पदाधिकारियों को भी पदमुक्त कर दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल नई टीम के गठन का है। यह फैसला स्थानीय नेताओं के लिए सिर्फ पदों में बदलाव नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरणों के पुनर्गठन का संकेत भी है। नई कमेटियों में किन चेहरों को जगह मिलती है, इससे यह पता चलेगा कि पार्टी नेतृत्व स्थानीय गुटों के बीच संतुलन किस तरह साधना चाहता है। फिलहाल इतना साफ है कि एटा-कासगंज में सपा ने पुराने संगठन पर ब्रेक लगाकर नए सिरे से शुरुआत का रास्ता खोल दिया है।

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