इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छीनी लखनऊ मेयर की ताकत! सुषमा खरकवाल पर सबसे बड़ा एक्शन

Published : May 21, 2026, 05:52 PM IST
Allahabad High Court Freezes Lucknow Mayor Sushma Kharkwal Powers Over Councillor Oath Row

सार

Sushma Kharkwal: लखनऊ मेयर सुषमा खरकवाल पर हाईकोर्ट ने बड़ी कार्रवाई करते हुए उनके वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सीज कर दिए हैं। वार्ड 73 के निर्वाचित पार्षद को पांच महीने तक शपथ न दिलाने पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।

Lucknow Mayor Powers Seized: लखनऊ नगर निगम से जुड़ा एक बड़ा मामला अब राजनीतिक और कानूनी बहस का केंद्र बन गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मेयर Sushma Kharkwal के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए उनके वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सीज करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह कार्रवाई वार्ड संख्या 73 फैजुल्लागंज के निर्वाचित पार्षद को शपथ न दिलाने के मामले में की है।

हाईकोर्ट की इस टिप्पणी और आदेश ने साफ संकेत दिया है कि न्यायालय अपने आदेशों की अवहेलना को गंभीरता से ले रहा है। खास बात यह है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों स्तरों पर निर्देश मिलने के बावजूद पांच महीने तक निर्वाचित पार्षद को शपथ नहीं दिलाई गई।

क्या है पूरा मामला?

मामला फैजुल्लागंज वार्ड संख्या-73 से जुड़ा है, जहां ललित किशोर तिवारी को निर्वाचित पार्षद घोषित किया गया था। चुनावी प्रक्रिया पूरी होने और वैधानिक स्थिति स्पष्ट होने के बावजूद उन्हें शपथ नहीं दिलाई गई। इस देरी को लेकर मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने पक्ष रखा। कोर्ट में यह दलील दी गई कि निर्वाचित प्रतिनिधि को लंबे समय तक शपथ से वंचित रखना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है।

 

 

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हाईकोर्ट ने क्यों दिखाई सख्ती?

जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस क़मर हसन रिज़वी की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि कोर्ट के आदेशों का पालन अनिवार्य है। अदालत ने माना कि जब किसी उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित कर दिया गया है, तो उसे शपथ दिलाना नगर निगम प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी है। कोर्ट ने साफ कहा कि जब तक निर्वाचित पार्षद को शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक मेयर के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सीज रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था मामला

सूत्रों के मुताबिक यह मामला पहले सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका था। वहां से भी स्पष्ट निर्देश मिलने के बाद उम्मीद थी कि नगर निगम प्रशासन जल्द कार्रवाई करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी वजह से हाईकोर्ट ने अब सीधे तौर पर कठोर प्रशासनिक कदम उठाया है। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह आदेश स्थानीय निकायों के लिए बड़ा संदेश है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकारों में अनावश्यक देरी को अदालतें गंभीरता से देख रही हैं।

राजनीतिक हलकों में बढ़ी चर्चा

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद लखनऊ की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दल इसे नगर निगम प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल बता रहे हैं, जबकि भाजपा की ओर से अभी विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह का आदेश किसी मौजूदा मेयर के खिलाफ दुर्लभ माना जाता है, क्योंकि इसमें सीधे तौर पर प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियों को सीमित किया गया है।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर कोर्ट का जोर

इस पूरे मामले में हाईकोर्ट का मुख्य फोकस लोकतांत्रिक प्रक्रिया और निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकारों की रक्षा पर दिखाई दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि को समय पर शपथ दिलाना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है। फिलहाल अब सबकी नजर इस बात पर है कि नगर निगम प्रशासन कोर्ट के आदेश का पालन कितनी जल्दी करता है और पार्षद को शपथ दिलाने की प्रक्रिया कब पूरी होती है।

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