
Bangladesh PM Tarique Rahman First Foreign Visit: दक्षिण एशिया की राजनीति में इस वक्त एक ऐसा भूचाल आया है जिसने रणनीतिक विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। बांग्लादेश के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा पर निकलने वाले हैं, लेकिन इस यात्रा के शेड्यूल ने नई दिल्ली के राजनयिक गलियारों में सन्नाटा खींच दिया है। पारंपरिक रूप से बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद प्रधानमंत्री की पहली पसंद हमेशा भारत होता रहा है, लेकिन पीएम तारिक़ रहमान ने इस बार परंपरा की बेड़ियों को तोड़ते हुए मलेशिया और चीन को अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए चुना है। यह फैसला महज एक दौरा नहीं, बल्कि उपमहाद्वीप की भू-राजनीति में आने वाले बड़े तूफान का संकेत है।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि भारत को अपना सबसे करीबी पड़ोसी मानने वाला बांग्लादेश अचानक रणनीतिक दूरी बनाने लगा? इसके पीछे की कड़वाहट हाल ही में दिल्ली एयरपोर्ट पर हुई एक घटना से जुड़ी मानी जा रही है। दरअसल, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के बेहद करीबी सहयोगी जाहेद उर रहमान को दिल्ली हवाई अड्डे पर सुरक्षा जांच के नाम पर दो घंटे से ज्यादा समय तक रोका गया। यह घटना ढाका को इस कदर नागवार गुजरी कि बांग्लादेश ने अपनी संप्रभुता और राजनयिक संवेदनशीलता का हवाला देते हुए भारत के डिप्टी हाई कमिश्नर को तलब कर औपचारिक कड़ा विरोध दर्ज करा दिया। राजनयिक पंडितों का मानना है कि इस 'एयरपोर्ट विवाद' ने सुलगती आग में घी का काम किया है, जिससे दोनों देशों के बीच छिपी हुई दूरियां सरेआम आ गईं।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, रहमान सबसे पहले मलेशिया जाएंगे और वहां प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम से मुलाकात करेंगे। इसके बाद वे चीन की चार दिवसीय यात्रा पर रवाना होंगे, जहां उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रीमियर ली कियांग से होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक औपचारिक दौरा नहीं, बल्कि बांग्लादेश की बदलती रणनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत हो सकता है।
रविवार को कुआलालंपुर में मलेशियाई पीएम अनवर इब्राहिम से मुलाकात के ठीक बाद, 23 जून से तारिक़ रहमान की चीन की चार दिवसीय महा-यात्रा शुरू होने जा रही है। सस्पेंस इस बात को लेकर है कि इस यात्रा के दौरान बांग्लादेश और चीन के बीच 15 से 17 बड़े द्विपक्षीय समझौतों (MoUs) पर हस्ताक्षर होने वाले हैं। रहमान सीधे चीनी प्रीमियर ली कियांग और राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करेंगे। लेकिन सबसे बड़ा झटका भारत के लिए 'तीस्ता प्रोजेक्ट' को लेकर है। भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी के पानी का बंटवारा सालों से लंबित है। अब चीन इस प्रोजेक्ट में भारी निवेश और नदी मैनेजमेंट के जरिए बांग्लादेश में अपनी पैठ मजबूत करने की ताक में है। हाल ही में बांग्लादेश ने चट्टोग्राम में चीनी आर्थिक क्षेत्र के लिए 340 मिलियन अमेरिकी डॉलर के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है, जिसके लिए चीन भारी-भरकम रियायती लोन दे रहा है।
साल 2024 में हुए उस तख्तापलट और हिंसक विद्रोह को कोई नहीं भूल सकता, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार गिर गई थी और उन्हें देश छोड़ना पड़ा था। उसके बाद मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौर में भारत-बांग्लादेश संबंधों में अभूतपूर्व गिरावट आई।
हालांकि, इस साल की शुरुआत में तारिक़ रहमान की चुनावी जीत के बाद लगा था कि रिश्ते सुधरेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद उन्हें बधाई देकर सपरिवार नई दिल्ली आने का न्योता दिया था। यहाँ तक कि भारतीय लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने ढाका जाकर उनके शपथ ग्रहण में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया था। लेकिन, हालिया घटनाक्रमों और आसियान (ASEAN) समूह तथा आरसीईपी (RCEP) में शामिल होने के लिए मलेशिया का समर्थन मांगने की ढाका की जल्दबाजी यह साफ बयां करती है कि बांग्लादेश अब अपनी विदेश नीति का संतुलन पूरी तरह पूर्व की तरफ झुका रहा है। क्या भारत इस डैमेज को कंट्रोल कर पाएगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
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