दोपहर बाद करीब चार बजे हुरियारे रंगीली गली पहुंचे। ढोल-नगाड़ों की थाप पर ब्रज के पारंपरिक रसिया और होली गीत गाए गए। हुरियारों ने गीतों के जरिए हुरियारिनों को रिझाने की कोशिश की।
इसके जवाब में महिलाओं ने हंसी-ठिठोली के बीच लाठियां बरसाईं। पुरुषों ने चमड़े की मजबूत ढाल से अपना बचाव किया। देखने वालों के लिए यह दृश्य रोमांच और आस्था का अद्भुत संगम था।
मान्यता है कि यह परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है। जब भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ राधा रानी को चिढ़ाने बरसाना आए थे, तब सखियों ने उन्हें लाठियों से खदेड़ा था। उसी घटना की याद में आज भी यह लठामार होली खेली जाती है। ब्रज में होली बसंत पंचमी से शुरू होकर करीब 45 दिनों तक चलती है और उसका सबसे बड़ा आकर्षण यही लठामार होली होती है।
देश के अलग-अलग हिस्सों से आए श्रद्धालुओं के लिए यह अनुभव अविस्मरणीय रहा। श्रद्धालु भारती ने कहा कि उन्होंने पहली बार ऐसी होली देखी है, जहां लाठियों की मार में भी प्रेम और भक्ति साफ महसूस होती है। उन्हें लगा जैसे खुद कान्हा इस उत्सव में मौजूद हों।
स्वाति नाम की एक अन्य श्रद्धालु ने कहा कि इतनी बड़ी भीड़ के बावजूद व्यवस्था बेहतरीन रही। प्रशासन हर जगह मुस्तैद दिखा। हेलीकॉप्टर से फूल बरसने का पल उनके लिए सबसे खास रहा।
नंदबाबा मंदिर के मुख्य पुजारी मनीष गोस्वामी ने बताया कि नंदगांव और बरसाना का रिश्ता द्वापर युग से जुड़ा है। यह लाठियां चोट पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के प्रेम और मनुहार का प्रतीक हैं। पूरा ब्रज इस समय प्रेम रस में डूबा हुआ है।