प्राइवेट पार्ट पर 10 बार चाकू से वार, दुष्कर्म के वक्त वो कितना बेबस थी-कल्पना रूह कंपा देती है: HC

Published : Jan 24, 2026, 12:45 PM IST

भोपाल शाहजहांनाबाद में 5 साल बच्ची से दुष्कर्म-हत्या: अतुल निहाले को MP हाईकोर्ट फांसी बरकरार। चाकू 10 वार, मां-बहन ने लाश छिपाई। POKSO कोर्ट बोली- दुर्लभतम अपराध। बच्ची की पीड़ा रूह कंपा देगी।

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MP High Court: भोपाल के शाहजहांनाबाद में 24 सितंबर 2024 को हुई एक भयानक वारदात ने पूरे मध्य प्रदेश को हिला कर रख दिया। आरोपी अतुल निहाले ने एक पांच साल की मासूम बच्ची से दुष्कर्म किया और उसकी हत्या कर दी। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए मप्र हाई कोर्ट ने भोपाल की विशेष पॉक्सो कोर्ट द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को बरकरार रखा है। क्या कोई सजा इस जघन्य अपराध के लिए काफी हो सकती है?

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घटना कैसे हुई थी?

24 सितंबर 2024 को जब बच्ची गली में खेल रही थी और फॉगिंग मशीन से धुआँ फैलाया जा रहा था, तब आरोपी अतुल निहाले ने धुएँ का फायदा उठाकर बच्ची को अपने घर खींच लिया। वहां उसने मासूम से दुष्कर्म किया और नृशंस हत्या कर दी। जब उसकी माँ और बहन घर लौटे, तो उन्होंने अतुल को बचाने के लिए बच्ची की लाश को फ्लैट की पानी की टंकी में फेंक दिया। दो दिन बाद बच्ची की लाश मिली, और यह भयानक मामला सार्वजनिक हुआ।

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विशेष पॉक्सो कोर्ट का फैसला

भोपाल की विशेष पॉक्सो कोर्ट की न्यायाधीश कुमुदिनी पटेल ने आरोपी अतुल निहाले को फांसी की सजा सुनाई। साथ ही, बच्ची की माँ और बहन को दो-दो साल की जेल दी गई। न्यायाधीश ने कहा था, "यदि मृत्युदंड से भी बड़ी कोई सजा होती, तो आरोपी उसका पात्र होता।" कोर्ट ने अपराध की अमानवीयता और मासूम बच्ची की पीड़ा को रूह कंपा देने वाला बताया।

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मप्र हाई कोर्ट ने फांसी की सजा क्यों बरकरार रखी?

  • जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रामकुमार चौबे की डबल बेंच ने यह फैसला सुनाया।
  • हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपी का अपराध दुर्लभतम और नृशंस है।
  • अदालत ने अभियोजन द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों की मजबूत कड़ी को मान्यता दी।
  • बच्ची ने जो पीड़ा झेली, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
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क्या यह मामला भविष्य के लिए मिसाल बनेगा?

यह मप्र में बीएनएस लागू होने के बाद पहली फांसी की सजा है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसे अपराध के लिए कोई नरमी नहीं बरती जाएगी। आरोपी को फांसी, मां और बहन को दो साल की जेल, और हाई कोर्ट ने सजा बरकरार रखी। फिर भी समाज और परिवार की पीड़ा कम नहीं हुई है। इस मामले ने एक बार फिर मासूमों की सुरक्षा, पॉक्सो एक्ट और मृत्युदंड की आवश्यकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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