
बिहार की एक कंज्यूमर कोर्ट ने ट्रेन में यात्रियों को कन्फर्म सीट न दे पाने के लिए इंडियन रेलवे को जिम्मेदार ठहराया है। भोजपुर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने रेलवे को उन चार यात्रियों को मुआवजा देने का आदेश दिया है, जिन्हें कन्फर्म टिकट होने के बावजूद खड़े होकर यात्रा पूरी करनी पड़ी थी। एक रिपोर्ट के मुताबिक, कमीशन ने माना कि रेलवे की इस लापरवाही की वजह से यात्रियों को 'मानसिक, शारीरिक और आर्थिक परेशानी' झेलनी पड़ी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना LTT-पटना एक्सप्रेस में हुई, जब यात्री उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में विंध्याचल से बिहार के आरा जा रहे थे। शिकायत में कहा गया है कि जब चारों यात्री ट्रेन में चढ़े, तो उन्होंने देखा कि उनकी कन्फर्म सीटों पर रेलवे के ही कर्मचारी बैठे हुए हैं। यात्रियों का दावा है कि उन्होंने स्टाफ से बार-बार सीट खाली करने को कहा, लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गई। आखिर में, उनके पास खड़े होकर सफर करने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा। बाद में इंसाफ के लिए इन यात्रियों ने कंज्यूमर कमीशन का दरवाजा खटखटाया।
कमीशन के अध्यक्ष कृष्ण प्रताप सिंह और सदस्य कमल किशोर सिंह की बेंच ने सभी सबूतों और दस्तावेजों की जांच के बाद यात्रियों के हक में फैसला सुनाया। कमीशन ने नॉर्थ सेंट्रल रेलवे और रेल मंत्रालय को निर्देश दिया कि वे टिकट के 1,876.80 रुपये 8 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ यात्रियों को वापस करें। टिकट रिफंड के अलावा, रेलवे को यात्रियों को हुई परेशानी के लिए 20,000 रुपये का मुआवजा और कानूनी खर्च के तौर पर 15,000 रुपये देने का भी आदेश दिया गया है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर यह रकम 60 दिनों के अंदर नहीं चुकाई गई, तो यात्री 10 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ कानूनी कार्रवाई के जरिए इसे वसूलने के हकदार होंगे।
शिकायत के मुताबिक, यात्रियों ने सफर के दौरान ही रेलवे हेल्पलाइन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, जैसे 'रेलवे सेवा' और 'रेल मंत्रालय' के चैनलों पर मदद मांगने की कोशिश की थी। उन्हें SMS के जरिए शिकायत के रेफरेंस नंबर तो मिल गए, लेकिन ट्रेन में रहते हुए उनकी समस्या पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यात्रियों ने यह भी दावा किया कि जब उन्होंने बक्सर स्टेशन पर एक ट्रैवलिंग टिकट एग्जामिनर (TTE) के सामने यह मुद्दा उठाया, तो उनसे कथित तौर पर ट्रेन में भारी भीड़ का हवाला देते हुए "मैनेज" करने को कहा गया।
सुनवाई के दौरान, रेलवे ने दलील दी कि यह मामला कानून और व्यवस्था से जुड़ा है, इसलिए यह सरकारी रेलवे पुलिस (GRP) के अधिकार क्षेत्र में आता है। रेलवे अधिकारियों ने सेवा में किसी भी तरह की कमी से इनकार किया और दावा किया कि शिकायत पर पहले ही उचित कार्रवाई की जा चुकी है। हालांकि, यात्रियों द्वारा जमा किए गए टिकट, शिकायत के रिकॉर्ड, टेक्स्ट मैसेज और तस्वीरों की जांच के बाद, कमीशन इस नतीजे पर पहुंचा कि यात्रियों को वाकई उनकी आरक्षित सीटों से वंचित किया गया था।
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