
China Medog Dam Threat: नेपाल और तिब्बत सीमा पर आई भयावह बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में अब तक के सबसे बड़े संकट को जन्म दे दिया है। ग्लेशियर टूटने और भारी मलबे के बहाव से आई इस प्राकृतिक आपदा में अब तक 626 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 3,000 के करीब लोग लापता हैं। इस त्रासदी में 320 से अधिक भारतीय नागरिक भी लापता बताए जा रहे हैं। इस जलप्रलय ने भारत के सामने एक बड़ा और गंभीर रणनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बेहद संवेदनशील हिमालयी सीस्मोलॉजी के बीच चीन द्वारा बनाया जा रहा 60,000 मेगावाट का मेडोग (मोटो) बांध भारत के लिए 'वॉटर बम' साबित हो सकता है? आइए जानते हैं ऐसा क्यों कहा जा रहा है और यह भारत के लिए कितनी चिंता वाली बात है?
26 अगस्त को नेपाल में आए बाढ़ से बड़ी तबाही मची। यूएस जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) के अनुसार, लांगटांग नेशनल पार्क के पास ग्लेशियर टूटने से 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर ऊर्जा पैदा हुई। इसके चलते निकला मलबा और पानी 100 किलोमीटर दूर तक बस्तियों, सड़कों और पुलों को बहा ले गया। हालांकि, इस आपदा का चीन के निर्माणाधीन बांध से सीधा संबंध नहीं है, लेकिन इसने यह साबित कर दिया है कि हिमालय के नाजुक इकोसिस्टम में बड़े ढांचे बनाना कितना विनाशकारी हो सकता है।
चीन तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी (Yarlung Tsangpo River) के निचले हिस्से पर 60,000 MW की विशाल क्षमता वाला मेडोग हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट (Medog Hydropower Station) बना रहा है। यह दुनिया के सबसे बड़े 'थ्री गॉर्जियस डैम' से भी तीन गुना बड़ा होगा। यह प्रोजेक्ट अरुणाचल प्रदेश सीमा के बेहद करीब उस मोड़ पर बन रहा है, जहां नदी 'यू-टर्न' लेती है। यही नदी भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश कर 'सियांग' और आगे असम में 'ब्रह्मपुत्र' बनती है। यानी चीन नदी के ऊपरी हिस्से में है, जबकि भारत नीचे की ओर स्थित है।
भारत की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ यह नहीं है कि चीन कभी नदी का पानी रोक सकता है। इससे भी बड़ा सवाल पानी के समय और मात्रा पर कंट्रोल का है। मान लीजिए किसी इलाके में भारी बारिश हो रही है और उसी समय ऊपर की ओर बने विशाल जलाशय से बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है। ऐसी स्थिति में नीचे के इलाकों में बाढ़ की स्थिति और गंभीर हो सकती है। वहीं, कम बारिश या सूखे जैसे हालात में नदी में पानी के प्रवाह और समय में बदलाव का असर खेती, मछली पालन, लोगों की आजीविका और पूरे इकोसिस्टम पर पड़ सकता है। ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र पर लाखों लोग निर्भर हैं। इसलिए भारत के लिए यह सिर्फ बिजली उत्पादन का मामला नहीं, बल्कि वाटर सिक्योरिटी और रणनीतिक सुरक्षा का भी सवाल है।
स्ट्रैटेजिक एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी और पूर्व राजदूत राजीव डोगरा ने चेतावनी दी है कि सीस्मिक जोन में बना यह बांध किसी भी प्राकृतिक आपदा या अचानक पानी छोड़े जाने की स्थिति में भारत के पूर्वोत्तर खासकर असम-अरुणाचल और बांग्लादेश में महाविनाश ला सकता है। सबसे बड़ी चिंता डैम के नीचे एक्टिव फॉल्ट है। चीन के मेडोग प्रोजेक्ट (Medog Project) को लेकर चिंता उस समय और बढ़ गई जब रिपोर्टों में प्रोजेक्ट क्षेत्र के नीचे एक सक्रिय भूगर्भीय फॉल्ट की पहचान किए जाने का जिक्र सामने आया। पैजेन फॉल्ट (Paizhen Fault) को लेकर शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि इसकी गतिविधियां बांध और दूसरे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की संरचना को प्रभावित कर सकती हैं। उन्होंने भूस्खलन और ढलान के जोखिम को कम करने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की जरूरत बताई।
The Himalayas are the world’s most seismically active major mountain range, with a record of triggering devastating earthquakes. How even a moderate seismic event can trigger massive cascading effects was illustrated today when a magnitude 4.4 quake along the Tibet-Nepal border…
— Dr. Brahma Chellaney (@Chellaney) August 26, 2026
1. पानी की सुरक्षा का सवाल
चीन नदी के ऊपरी हिस्से में मौजूद है। इतने बड़े जलविद्युत और जलाशय सिस्टम से नदी के प्रवाह को नियंत्रित करने की क्षमता बढ़ सकती है। इसका असर नीचे की ओर भारत में पानी की उपलब्धता और प्रवाह के पैटर्न पर पड़ सकता है।
2. बाढ़ का खतरा
भारी बारिश, किसी प्राकृतिक आपदा, अचानक पानी छोड़े जाने या किसी इंफ्रास्ट्रक्चर फेल होने जैसी स्थिति में नीचे के क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है। हालांकि, ऐसी किसी घटना की संभावना और उसका वास्तविक पैमाना तय करना आसान नहीं है। लेकिन अगर कोई बड़ा हादसा होता है तो उसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
3. हिमालय का भूगर्भीय जोखिम
हिमालय दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल है। यहां भूकंप, भूस्खलन और ग्लेशियर के टूटने जैसी घटनाएं किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती हैं।
चीन के इस कदम से निपटने के लिए भारत सरकार अरुणाचल प्रदेश में 11,000 मेगावाट से अधिक क्षमता वाले 'अपर सियांग मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट' पर काम आगे बढ़ा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य बिजली उत्पादन के साथ-साथ जल भंडारण क्षमता बढ़ाना है, ताकि चीन द्वारा अचानक पानी छोड़े जाने पर उसे नियंत्रित किया जा सके और सूखे के समय पानी की सप्लाई पानी की सप्लाई बनी रहे।
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