
Congress Rajya Sabha Defeat: भारतीय राजनीति में कभी-कभी ऐसे घटनाक्रम सामने आते हैं जो सिर्फ चुनावी नतीजे नहीं होते, बल्कि किसी दल की अंदरूनी ताकत, कमजोरी और रणनीतिक क्षमता का आईना बन जाते हैं। हालिया राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों के नतीजों ने कांग्रेस के सामने ठीक ऐसा ही आईना रख दिया है। एक तरफ झारखंड और मध्य प्रदेश में पार्टी को ऐसी शर्मनाक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, जहां उसके पास अवसर मौजूद थे। दूसरी तरफ कर्नाटक में कांग्रेस ने ऐसा राजनीतिक प्रबंधन दिखाया कि विरोधी दलों के विधायक भी उसके पक्ष में वोट करते नजर आए। सवाल यह है कि आखिर एक ही दिन कांग्रेस की दो बिल्कुल अलग तस्वीरें क्यों दिखाई दीं?
झारखंड में कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की जीत लगभग तय मानी जा रही थी। पार्टी ने पर्यवेक्षक भी भेजे थे और गठबंधन सरकार सत्ता में थी। लेकिन मतदान के समय समीकरण अचानक बदलते दिखाई दिए। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सहयोगी दलों के कुछ विधायकों ने क्रॉस-वोटिंग की। आरजेडी और अन्य सहयोगी दलों की नाराज़गी पहले से मौजूद थी। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व समय रहते इस असंतोष को दूर नहीं कर पाया। स्थिति तब और रहस्यमय बन गई जब चुनाव से पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवानी से मुलाकात चर्चा का विषय बन गई। भले ही इसका कोई प्रत्यक्ष राजनीतिक अर्थ न निकाला गया हो, लेकिन कई विधायकों ने इसे अलग संकेत के रूप में देखा। परिणामस्वरूप कांग्रेस का गणित बिगड़ गया और पार्टी को अप्रत्याशित झटका लगा।
पार्टी के भीतर सबसे ज्यादा सवाल चुनाव प्रबंधन पर उठ रहे हैं। वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी के बावजूद संगठनात्मक समन्वय कमजोर दिखाई दिया। सूत्रों का दावा है कि चुनाव से पहले गठबंधन सहयोगियों के साथ पर्याप्त संवाद नहीं हुआ। कई नेताओं का मानना है कि यदि शीर्ष नेतृत्व सक्रिय भूमिका निभाता तो क्रॉस-वोटिंग जैसी स्थिति रोकी जा सकती थी। यही वजह है कि अब हार के बाद जिम्मेदारी तय करने की मांग तेज हो गई है।
मध्य प्रदेश से जो खबर आई, उसने कांग्रेस आलाकमान के होश उड़ा दिए। यहां राहुल गांधी की बेहद करीबी मानी जाने वाली वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन राज्यसभा उम्मीदवार थीं। लेकिन वोटिंग की नौबत ही नहीं आई; 9 जून को रिटर्निंग ऑफिसर ने उनके नामांकन पत्र को सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि उनका 'हलफनामा' (Affidavit) अधूरा था। तीन बार लोकसभा चुनाव लड़ चुकीं एक इतनी बड़ी "बुद्धिजीवी" नेता से ऐसी तकनीकी चूक होना किसी के गले नहीं उतर रहा है। दिल्ली के गलियारों में चर्चा है कि यह कोई साधारण गलती नहीं बल्कि पार्टी के भीतर की एक गहरी 'अंदरूनी साजिश' है, क्योंकि नटराजन को टिकट देते समय कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी जैसे एमपी के क्षत्रपों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया था।
जहां एक तरफ मध्य प्रदेश और झारखंड में कांग्रेस अपनी रणनीतियों का जनाजा उठते देख रही थी, वहीं दूसरी तरफ कर्नाटक से आए नतीजों ने सबको स्तब्ध कर दिया। विधान परिषद (MLC) की पांच सीटों पर कांग्रेस के पास केवल 135 विधायकों का संख्या बल था, लेकिन जब पेटियां खुलीं तो कांग्रेस को 151 वोट मिले थे! कर्नाटक के संकटमोचक कहे जाने वाले डी.के. शिवकुमार और बी.के. हरिप्रसाद ने बैकस्टेज ऐसा चक्रव्यूह रचा कि बीजेपी और जेडीएस (JDS) के खेमे में भारी बगावत हो गई। बीजेपी को मिलने वाले 64 वोटों के बजाय सिर्फ 57 वोट मिले, जबकि जेडीएस के भी 4 विधायक टूट गए। हरिप्रसाद ने 'इंडिया टुडे' से बात करते हुए साफ कहा कि उन्होंने "किसी भी चीज को किस्मत के भरोसे नहीं छोड़ा था" और उन्होंने विपक्षी खेमे के असंतोष का ऐसा फायदा उठाया कि बीजेपी देखती रह गई।
इन तीन राज्यों के नतीजे सिर्फ चुनावी जीत-हार की कहानी नहीं हैं। वे कांग्रेस के सामने मौजूद उस बड़ी चुनौती को उजागर करते हैं जिसमें संगठन, गठबंधन प्रबंधन और राजनीतिक रणनीति की क्षमता की परीक्षा होती है। झारखंड और मध्य प्रदेश में हुई गलतियां बताती हैं कि पार्टी अभी भी समन्वय और अनुशासन की समस्याओं से जूझ रही है। वहीं कर्नाटक की सफलता दिखाती है कि जब संगठन सक्रिय और नेतृत्व केंद्रित हो, तो कांग्रेस आज भी राजनीतिक चमत्कार करने की क्षमता रखती है।
कांग्रेस हमेशा बीजेपी पर धनबल और दलबदल का आरोप लगाती है, लेकिन इन नतीजों ने साबित कर दिया है कि बीजेपी से लड़ने से पहले कांग्रेस को अपने आंतरिक मैनेजमेंट, रूठे सहयोगियों और ढीले उम्मीदवारों को संभालना होगा। अगर पार्टी खुद को आगामी 2027 के विधानसभा और 2029 के आम चुनावों में मजबूत विकल्प के रूप में पेश करना चाहती है, तो उसे कर्नाटक के इस फॉर्मूले को पूरे देश में लागू करना ही होगा, वरना आत्मघाती गलतियों का यह सिलसिला उसे गर्त में ले जाएगा।
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