
भारत की जान कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मॉनसून का सही वक्त पर न बरसना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। समय पर आने वाली बारिश ही खेती-किसानी के कैलेंडर को पटरी पर रखती है। लेकिन इस बार मुंबई में मॉनसून के पहुंचने में करीब दो हफ्ते की देरी हो गई, जिसने बड़ी चिंता पैदा कर दी है। जून का महीना धान, कपास और मक्के जैसी खरीफ फसलों की बुवाई का अहम समय होता है। लेकिन किसान बीज बोने से पहले पहली बारिश के लिए तरस रहे हैं। जून खत्म होने को है और बारिश का न होना देश की करीब 25 लाख करोड़ रुपये की कृषि अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाल रहा है। ऊपर से प्रशांत महासागर में बन रहा 'सुपर अल नीनो' इस मामले को और भी बिगाड़ रहा है।
इस सूखे का सबसे ज्यादा असर मध्य भारत और दक्कन के पठारी इलाकों पर पड़ा है। यह भारत का कृषि गढ़ है, जो पश्चिम में राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक से लेकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना तक फैला है। देश की ज्यादातर मुख्य फसलें इसी इलाके में उगती हैं। सब्जियां और फल भी यहीं से आते हैं, इसलिए यहां की स्थिति सीधे तौर पर देशभर के बाजारों में महंगाई पर असर डालेगी।
मुंबई के उत्तर-पूर्व में मौजूद नासिक जिला भारत का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक केंद्र है। प्याज की बढ़ती कीमतें आम आदमी के घर का बजट बिगाड़ देती हैं और इनमें सरकारों को गिराने तक की ताकत होती है, इसलिए यह राजनीतिक रूप से भी एक अहम फसल है। मॉनसून में कमी का असर आमतौर पर अगस्त-सितंबर में प्याज की कीमतों में आग लगाकर दिखता है। इस महीने नासिक में औसत से सिर्फ 16 फीसदी बारिश हुई है।
कुछ महीने पहले तक, भारतीय कृषि क्षेत्र की सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण खाड़ी देशों से आने वाले यूरिया की सप्लाई रुकने का डर था। लेकिन अब खाद से भी बड़ी चिंता पानी की हो गई है, जिसकी कमी एक गंभीर संकट बनती जा रही है।
इस संकट का असर सिर्फ खेतों तक ही सीमित नहीं रहेगा। खाने के तेल, चीनी और कपास का उत्पादन घटने से महंगाई बढ़ेगी। देश में महंगाई पहले से ही ऊंचे स्तर पर है, और यह 2025 की शुरुआत तक एक बड़ी चुनौती बनी रह सकती है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी साफ कर दिया है कि यह असामान्य मौसम देश के आर्थिक विकास के अनुमानों के लिए भी एक खतरा है।
इस संकट से निपटने के लिए सरकार जो कदम उठाएगी, उसका असर दुनिया के बाजारों पर भी पड़ेगा। 2023 में जब मॉनसून देर से आया था और शुरुआती दौर में बाढ़ आ गई थी, तब भारत ने घरेलू बाजार को सुरक्षित रखने के लिए चावल के निर्यात पर रोक लगा दी थी। दुनिया को 40% चावल भारत ही बेचता है, इसलिए इस फैसले ने ग्लोबल मार्केट में हलचल मचा दी थी। अब माना जा रहा है कि इसी तरह की पाबंदियां चीनी के निर्यात पर भी लग सकती हैं।
पहले के मुकाबले भारतीय अर्थव्यवस्था अब ऐसे संकटों का सामना करने के लिए ज्यादा तैयार है। ईरान युद्ध के असर से निपटने में खाद के रिजर्व स्टॉक ने मदद की थी। 2023 के निर्यात बैन के बाद गोदामों में चावल का स्टॉक लगभग दोगुना हो गया है, और गेहूं के मामले में भी ऐसी ही सुरक्षा है। सिंचाई सुविधाओं के विस्तार, कृषि विज्ञान और बेहतर लॉजिस्टिक्स के कारण आज खाद्य सुरक्षा का सिस्टम पहले से ज्यादा मजबूत है।
लेकिन, ये तकनीकी तरक्कियां भी ग्लोबल क्लाइमेट चेंज की रफ्तार का मुकाबला करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। दक्षिण एशिया में दुनिया की एक चौथाई आबादी सदियों से इसी सालाना मॉनसून पर निर्भर रही है। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के कारण अब इस बारिश का आना अप्रत्याशित हो गया है, जो कभी भयंकर सूखे तो कभी विनाशकारी बाढ़ का कारण बन रहा है। आने वाले 'सुपर अल नीनो' का असर बाजार में बड़ी उथल-पुथल मचाएगा, यह तय है।
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