
PM Modi Xi Jinping Meeting: एशिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों-भारत और चीन-के बीच का रिश्ता सालों से एक ही मोड़ पर अटका हुआ है। दोनों को एक-दूसरे की जरूरत भी है, लेकिन कोई भी एक-दूसरे की नीयत पर भरोसा करने को तैयार नहीं। अब जब दिल्ली में ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन होने जा रहा है, तो सवाल उठ रहा है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 2020 के गलवान संकट के बाद आई तल्खी को भुलाकर किसी टिकाऊ शांति की ओर बढ़ सकते हैं? शी जिनपिंग के इस दौरे को लेकर काफी सुगबुगाहट है। अगर वे दिल्ली आते हैं, तो 2019 के बाद यह उनका पहला भारत दौरा होगा। लेकिन असली मुद्दा यह नहीं है कि कैमरे के सामने दोनों नेता हाथ मिलाते हैं या नहीं। असली बात तो यह है कि क्या दोनों देश अपने रणनीतिक हितों के बीच इतना भरोसा कायम कर सकते हैं कि सीमा पर बार-बार बंदूकें न ताननी पड़ें।
जून 2020 में गलवान घाटी में हुई उस खूनी झड़प को कोई नहीं भूल सकता, जिसके बाद भारत-चीन रिश्ते दशकों के सबसे निचले स्तर पर चले गए थे। एलएसी (LAC) पर हजारों की तादाद में सैनिक आमने-सामने डट गए और भारत ने चीनी निवेश से लेकर ऐप तक पर कड़े कड़े कड़े कदम उठाए। नई दिल्ली का सीधा रुख था—जब तक सीमा पर शांति नहीं होगी, रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते। चार साल की तनातनी के बाद अक्टूबर 2024 में थोड़ी पिघलन दिखी, जब पूर्वी लद्दाख के देपसांग और डेमचोक में गश्त (पेट्रोलिंग) को लेकर दोनों पक्षों में सहमति बनी। कज़ान में हुई ब्रिक्स बैठक में मोदी और शी के बीच बातचीत हुई, जिसने लंबे समय से बंद पड़े कूटनीतिक रास्तों को फिर से खोला। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि दोनों देश अचानक बहुत गहरे दोस्त नहीं बन रहे हैं, बल्कि वे अपनी दुश्मनी को काबू में रखने की कोशिश कर रहे हैं ताकि बात फिर से जंग तक न पहुंचे।
#WATCH | The 18th BRICS Summit, set to take place in New Delhi, marks two decades of the grouping’s journey. With 21 member and partner states, BRICS has grown into a major global coalition, with China’s $20 trillion economy and leading export position adding significant economic… pic.twitter.com/mR5jNgoSQl
— DD News (@DDNewslive) September 8, 2026
ब्रिक्स उन गिने-चुने मंचों में से एक है जहां भारत और चीन किसी सैन्य गुट के तौर पर नहीं, बल्कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के बड़े खिलाड़ियों के तौर पर बैठते हैं।
दोनों देशों के मकसद अलग हैं, लेकिन मंच एक ही है। यही वजह है कि दिल्ली का यह सम्मेलन एक बहुत बड़ा लिटमस टेस्ट बनने वाला है।
अमेरिका के साथ भारत ने क्वाड (QUAD) और रक्षा सौदों के जरिए रिश्ते काफी मजबूत किए हैं, लेकिन नई दिल्ली ने कभी इसे चीन विरोधी गुट का रूप नहीं दिया। दूसरी तरफ, चीन अमेरिका के इंडो-पैसिफिक प्लान को अपने लिए सीधा खतरा मानता है। दिलचस्प बात यह है कि भारत और चीन दोनों ही दुनिया में किसी एक देश की दादागिरी के खिलाफ हैं और एक 'मल्टीपोलर वर्ल्ड' (बहुध्रुवीय दुनिया) चाहते हैं। हालांकि, भारत यह कभी नहीं चाहेगा कि बहुध्रुवीय दुनिया के नाम पर चीन पूरी दुनिया पर अपनी मर्जी चलाने लगे। इसलिए भारत बहुत सावधानी से अपनी विदेश नीति चला रहा है, जहाँ वह अपनी मर्जी का मालिक रहते हुए हर खेमे से बातचीत रख रहा है।
2024 में पेट्रोलिंग समझौता तो हो गया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सीमा का पुराना विवाद हल हो गया। कई इलाकों में सेना पीछे हटने (Disengagement) के बाद 'बफर जोन' बन गए हैं, जिससे दोनों सेनाओं की गश्त का दायरा बदला है। गलवान और पैंगोंग त्सो जैसे संवेदनशील इलाकों में अभी भी जमीनी हालात जस के तस बने हुए हैं। हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच बैठकों का सिलसिला जारी है। दोनों देश अब ऐसे 'गार्डरेल्स' (सुरक्षा घेरे) बनाने में लगे हैं ताकि सीमा की छोटी-मोटी घटना पूरे देश के कूटनीतिक रिश्तों को तबाह न कर दे।
आर्थिक मोर्चे पर दोनों देश बुरी तरह उलझे हुए हैं। भारत अपनी इंडस्ट्री, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी के लिए काफी हद तक चीनी सामान पर निर्भर है। लेकिन 2020 के बाद से भारत ने सुरक्षा चिंताओं के चलते कड़े कदम उठाए हैं। हाल ही में UPI और Alipay+ के बीच प्रस्तावित गठजोड़ को भारत सरकार द्वारा रोकना इसी बात का सबूत है। राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा प्राइवेसी और साइबर फ्रॉड का हवाला देकर भारत ने साफ कर दिया कि व्यापार अपनी जगह है, पर देश की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। हालांकि, खबर है कि आगामी बातचीत में भारतीय अफसर चीनी निवेश और तकनीक आयात से जुड़े नियमों पर ढील देने पर बात कर सकते हैं।
सच यही है कि दक्षिण एशिया से लेकर हिंद महासागर तक भारत और चीन के बीच प्रभाव जमाने की होड़ जारी रहेगी। पाकिस्तान के साथ चीन की नजदीकी और सीमा पर अविश्वास इतनी आसानी से खत्म होने वाला नहीं है। इसलिए, दोस्ती से ज्यादा व्यावहारिक बात यह है कि दोनों देश 'प्रतिस्पर्धा के साथ सह-अस्तित्व' (Competitive Coexistence) का रास्ता अपनाएं। इसका सीधा मतलब है:
दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स सम्मेलन सिर्फ हाथ मिलाने या फोटो खिंचवाने का जरिया नहीं होना चाहिए। असली कामयाबी तब मानी जाएगी जब दोनों देश किसी भी भावी तनाव से निपटने के लिए एक मजबूत सिस्टम बना सकें। दो परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसियों के लिए, जो 3,488 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा साझा करते हैं, एक समझदार और नियमों से चलने वाला 'प्रतिद्वंद्वी' बनना ही शायद सबसे व्यावहारिक दोस्ती है।
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