
नई दिल्लीः भारत ने रक्षा क्षेत्र में एक बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की है। अब भारत भी अमेरिका, रूस और इज़राइल जैसे उन गिने-चुने देशों के क्लब में शामिल हो गया है, जो इंटरकॉन्टिनेंटल रेंज यानी एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को रोक सकते हैं। यह कामयाबी रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के 10 और 11 जून को किए गए लगातार तीन सफल परीक्षणों के बाद मिली है। इन टेस्ट्स में मल्टी-लेयर्ड बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) सिस्टम को परखा गया और साथ ही नेवल एंटी-शिप मिसाइल-मीडियम रेंज (NASM-MR) का पहला सफल लॉन्च भी किया गया।
BMD परीक्षणों ने डिफेंस सिस्टम की हर लेयर पर टारगेट को भेदने की क्षमता को साबित किया। हर इंटरसेप्टर ने अपने लिए तय किए गए टारगेट को सफलतापूर्वक मार गिराया। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, परीक्षण के दौरान दुश्मन की बैलिस्टिक मिसाइल की तरह एक टारगेट मिसाइल लॉन्च की गई। इसके बाद जमीन और समुद्र में तैनात हमारे वेपन सिस्टम के राडारों ने इस खतरे का पता लगाया और उसे ट्रैक किया। फिर एयर डिफेंस इंटरसेप्टर सिस्टम को सिग्नल दिया गया, जिसने टारगेट को सफलतापूर्वक भेद दिया। इन परीक्षणों के सभी लक्ष्य पूरे हुए।
भारत का BMD प्रोग्राम दो दशकों से ज्यादा समय से चल रहा है। इसका फेज-I सिस्टम, जो करीब 2020 में ऑपरेशनल हुआ था, 2,000 किलोमीटर तक की रेंज वाली मिसाइलों को रोकने के लिए बनाया गया था। इसमें दो लेयर हैं - पृथ्वी एयर डिफेंस (PAD) जो 50 किलोमीटर से ऊपर के टारगेट को मार गिराता है, और एडवांस्ड एयर डिफेंस (AAD) जो कम ऊंचाई वाले खतरों को रोकता है।
अब फेज-II सिस्टम का परीक्षण किया गया है, जिसके नतीजों की घोषणा 13 जून, 2026 को की गई। यह सिस्टम इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) क्लास की मिसाइलों को रोकने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिनकी रेंज 5,500 किलोमीटर से भी ज़्यादा होती है। यह भारत की रक्षा क्षमता में एक बहुत बड़ा गुणात्मक उछाल है।
ये परीक्षण ऐसे समय में हुए हैं जब क्षेत्रीय सुरक्षा का माहौल तेजी से बदल रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV) तकनीक विकसित कर रहा है। इस तकनीक से एक ही मिसाइल एक साथ कई अलग-अलग ठिकानों पर कई वॉरहेड गिरा सकती है।
BMD परीक्षणों के साथ-साथ, NASM-MR का पहला सफल परीक्षण भी एक उतनी ही महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह मीडियम-रेंज एंटी-शिप मिसाइल भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाएगी, जिससे वह समुद्र में दुश्मन के जहाजों को दूर से ही निशाना बना सकेगी। यह मिसाइल पहले से मौजूद कम दूरी के सिस्टम और विकसित हो रहे लंबी दूरी के हाइपरसोनिक वेरिएंट्स के बीच की कमी को पूरा करेगी। DRDO ने हाल के वर्षों में समुद्र में मार करने वाले कई हथियारों का परीक्षण किया है। यह दिखाता है कि भारतीय नौसेना को खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में, विवादित समुद्री इलाकों में बढ़त दिलाने की कोशिशें तेज हो गई हैं।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इन सफल प्रदर्शनों के लिए DRDO को बधाई दी। रक्षा अनुसंधान और विकास विभाग के सचिव और DRDO के चेयरमैन, राजेश कुमार सिंह ने सीधे इन ट्रायल्स की निगरानी की और संगठन के वैज्ञानिकों और इंडस्ट्री पार्टनर्स के मिले-जुले प्रयासों की सराहना की। तीनों सेनाओं के वरिष्ठ अधिकारी भी इन परीक्षणों के गवाह बने।
ये परीक्षण भारत के स्वदेशी रक्षा उत्पादन में आई तेजी का हिस्सा हैं। सरकार ने हाल के वर्षों में घरेलू खरीद के लिए लगातार बड़े लक्ष्य तय किए हैं। तेजस लड़ाकू विमान से लेकर पिनाका रॉकेट आर्टिलरी सिस्टम और पनडुब्बी से लॉन्च होने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों तक, कई प्रोग्राम्स में DRDO की भूमिका केंद्रीय रही है, जो अब एडवांस्ड टेस्टिंग या सेना में शामिल होने के चरण में हैं।
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