
नई दिल्ली: विदेशी फंडिंग को लेकर प्रस्तावित विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन बिल (Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill) एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक चर्चा के केंद्र में है। इस बिल को लेकर उठ रही आपत्तियों के बीच केंद्र सरकार ने बातचीत का रास्ता अपनाया है। वरिष्ठ सरकारी सूत्रों के मुताबिक, सरकार संबंधित पक्षों की चिंताओं को दूर करने में जुटी है और अगले सप्ताह संसद में इस विधेयक को चर्चा के बाद पारित कराने की तैयारी कर रही है। सबसे अहम बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया की कमान स्वयं गृह मंत्री अमित शाह ने संभाल रखी है।
बिल में कुछ ऐसे प्रावधान हैं जिन्हें लेकर खासकर ईसाई संगठनों और कुछ राजनीतिक दलों ने सवाल उठाए हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं नए कानून का असर उन संस्थाओं की पुरानी संपत्तियों पर तो नहीं पड़ेगा, जिनका FCRA पंजीकरण पहले ही समाप्त हो चुका है और जो अब केवल घरेलू फंडिंग के सहारे काम कर रही हैं। इन्हीं आशंकाओं को देखते हुए सरकार ने सीधे संवाद का रास्ता चुना और विभिन्न संगठनों से बातचीत शुरू की।
गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को संसद भवन में मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा से मुलाकात की। बैठक के बाद लालदुहोमा ने बातचीत को सकारात्मक बताते हुए कहा कि उन्हें भरोसा दिलाया गया है कि प्रस्तावित कानून रेट्रोस्पेक्टिव (पिछली तारीख से लागू) नहीं होगा। सरकारी सूत्रों का भी कहना है कि विधेयक में कहीं भी ऐसा प्रावधान नहीं है जिससे पुराने मामलों या पहले से समाप्त हो चुके पंजीकरणों पर नया कानून लागू हो सके। सरकार का दावा है कि इस संबंध में फैली कई आशंकाएं तथ्यों पर आधारित नहीं हैं।
Another front against FCRA 2.0 opened
Christian leaders met HM Amit Shah & demanded that the FCRA Bill be either withdrawn or sent to a JPC for review.
Passing this bill is one the biggest challenges the Govt of India has ever faced pic.twitter.com/xU399Dcl7k https://t.co/s0rM6rIS88— THE DESI PROFESSOR (@desiprof_) August 6, 2026
विवाद मुख्य रूप से तीन धाराओं-14B, 16A और 16B-को लेकर है।
सरकारी सूत्रों का दावा है कि बिल का उद्देश्य किसी समुदाय या संस्था को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि विदेशी फंडिंग के उपयोग को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। सूत्रों के अनुसार, पिछले वर्ष देश में आए लगभग 17,000 करोड़ रुपये के विदेशी योगदान में से करीब 3,000 करोड़ रुपये ही ईसाई संस्थाओं को मिले थे। ऐसे में सरकार का कहना है कि यह कहना गलत होगा कि बिल विशेष रूप से ईसाई संगठनों को प्रभावित करने के लिए लाया जा रहा है। सरकार का यह भी कहना है कि कई स्तरों पर इस विधेयक को लेकर गलत धारणाएं फैलाई गई हैं।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस समाप्त हो जाता है, तो उसकी संपत्तियों के लिए केवल अंतरिम प्रबंधन व्यवस्था की जाएगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक उन संपत्तियों का दुरुपयोग न हो। सूत्रों के अनुसार, जैसे ही संबंधित संस्था को नया लाइसेंस मिल जाएगा, संपत्तियां वापस उसी संस्था को सौंप दी जाएंगी। सरकार का कहना है कि पुराने निवेशों या समाप्त हो चुके मामलों को पीछे जाकर प्रभावित करने का कोई इरादा नहीं है।
यह विधेयक 25 मार्च को पिछले सत्र के दौरान लोकसभा में पेश किया गया था। अब सरकार अगले सप्ताह इसे चर्चा और पारित कराने के लिए सदन में लाने की तैयारी कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, बहस के दौरान गृह मंत्री अमित शाह स्वयं सरकार का पक्ष रखेंगे और बिल से जुड़ी सभी प्रमुख आशंकाओं पर विस्तार से जवाब देंगे। ऐसे में अब निगाहें संसद की उस बहस पर टिकी हैं, जहां यह साफ होगा कि सरकार विपक्ष और संबंधित संगठनों की चिंताओं को किस हद तक दूर कर पाती है और क्या यह विधेयक बिना बड़े विवाद के संसद से पारित हो पाएगा।
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