
ग्रेटर नोएडा के एक Bennett University से सामने आया रैगिंग का मामला अब सिर्फ एक कॉलेज तक सीमित नहीं रह गया है। एक वायरल वीडियो ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है, क्या हमारे कैंपस सुरक्षित हैं? क्या हम अपने बच्चों को सही मायनों में शिक्षित कर पा रहे हैं? और सबसे अहम, क्या सजा भर से ऐसी मानसिकता बदली जा सकती है? यह घटना जितनी सरल दिखती है, उसके सवाल उतने ही गहरे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत एक ऐसे वीडियो से हुई, जिसने देखने वालों को असहज कर दिया। वीडियो में साफ दिखाई देता है कि कुछ छात्राएं मिलकर एक अन्य छात्रा के साथ मारपीट कर रही हैं और उसे अपमानित कर रही हैं। पीड़ित छात्रा बार-बार हाथ जोड़कर रुकने की विनती करती है, लेकिन उसके सामने खड़ी छात्राओं के चेहरे पर न तो संवेदना दिखती है और न ही रुकने का कोई इरादा।
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जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने लगा, विश्वविद्यालय प्रशासन हरकत में आया। बिना किसी देरी के मुख्य आरोपी छात्रा को रस्टिकेट कर दिया गया और उसके साथ शामिल अन्य छात्राओं पर भारी जुर्माना लगाया गया। यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अक्सर ऐसे मामलों में कार्रवाई में देरी या ढिलाई देखने को मिलती है। इस बार संस्थान ने साफ संकेत दिया कि अनुशासन और छात्रों की सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं किया जाएगा। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या केवल सख्त कार्रवाई ही इस समस्या का स्थायी समाधान है?
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। कार्रवाई के बाद एक और वीडियो सामने आया, जिसमें आरोपी छात्रा हॉस्टल छोड़ते हुए नजर आती है। इस वीडियो में वह हाथ जोड़ती हुई जरूर दिखती है, लेकिन उसके चेहरे के भाव और हल्की मुस्कान लोगों को चौंकाती है। कई लोगों ने इसे ‘ड्रामेबाजी’ कहा, तो कुछ ने इसे उस मानसिकता का प्रतीक माना, जहां गलती के बाद भी कोई पछतावा महसूस नहीं होता। यही वह पहलू है, जिसने इस मामले को और गंभीर बना दिया है। क्योंकि सजा का असली मकसद केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार लाना होता है।
यह घटना जैसे ही इंटरनेट पर फैली, लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। कई यूजर्स ने साफ कहा कि रैगिंग को ‘कूल’ या ‘स्वैग’ समझने की सोच ही सबसे बड़ी समस्या है। एक वायरल पोस्ट में इसे मानसिक बीमारी तक बताया गया और यह सवाल उठाया गया कि अगर सजा के बाद भी व्यवहार में बदलाव नहीं आता, तो क्या हम सिर्फ कानून के सहारे इस समस्या को खत्म कर सकते हैं? सोशल मीडिया की यह प्रतिक्रिया बताती है कि समाज अब ऐसी घटनाओं को हल्के में लेने के मूड में नहीं है।
विशेषज्ञों की मानें तो रैगिंग का प्रभाव सिर्फ उस समय तक सीमित नहीं रहता, जब घटना हो रही होती है। इसका असर लंबे समय तक पीड़ित के मन में रहता है। ऐसी घटनाएं आत्मविश्वास को तोड़ देती हैं, डर पैदा करती हैं और कई बार व्यक्ति को मानसिक तनाव की स्थिति में पहुंचा देती हैं। कुछ मामलों में यह अवसाद और सामाजिक दूरी तक का कारण बन सकता है। यही वजह है कि कानून और शिक्षा संस्थान रैगिंग को गंभीर अपराध मानते हैं, न कि किसी तरह की ‘मस्ती’ या ‘परंपरा’।
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