
वाशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिका में रहने वाले लाखों प्रवासियों और खासकर भारतीय टेक प्रोफेशनल्स के लिए पिछले कुछ दिन किसी भयानक दुःस्वप्न से कम नहीं थे। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन की इमिग्रेशन पर सख्ती की मुहिम के तहत अचानक एक ऐसा निर्देश आया, जिसने पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया। खबर आई कि अब ग्रीन कार्ड चाहने वाले हर विदेशी नागरिक को आवेदन की प्रक्रिया के दौरान अपने मूल देश लौटना होगा। लेकिन जैसे ही प्रवासियों और अमेरिकी नियोक्ताओं के बीच चौतरफा चीख-पुकार मची, अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट (DHS) को अचानक बैकफुट पर आना पड़ा। विभाग ने अब एक नया स्पष्टीकरण जारी कर इस खौफनाक नियम पर यू-टर्न ले लिया है, जिससे पैदा हुआ सस्पेंस और गहरा गया है।
इस पूरे सियासी और कानूनी ड्रामे की शुरुआत तब हुई जब यूएस सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज (USCIS) के प्रवक्ता ज़ैक काहलर ने एक बेहद सख्त और चौंकाने वाला बयान दे दिया। "अब से, कोई भी विदेशी नागरिक जो अमेरिका में अस्थायी रूप से रह रहा है और ग्रीन कार्ड चाहता है, उसे आवेदन करने के लिए अपने मूल देश लौटना होगा, सिवाय असाधारण परिस्थितियों के।"
काहलर का तर्क था कि इस नियम से उन लोगों को ढूंढने और देश से निकालने की मशक्कत कम हो जाएगी, जो ग्रीन कार्ड खारिज होने के बाद अमेरिका में छिपकर अवैध रूप से रहने का फैसला कर लेते हैं। इस बयान ने प्रवासियों, बड़ी कंपनियों और इमिग्रेशन वकीलों के पैरों तले जमीन खिसका दी थी। वर्ष 2024 में जारी हुए लगभग 1.4 मिलियन ग्रीन कार्ड्स में से एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी "स्टेटस समायोजन" (Adjustment of Status) के जरिए अमेरिका के भीतर से ही दिया गया था, जिसे यह नया नियम सीधे तौर पर ध्वस्त कर रहा था।
द न्यू यॉर्क टाइम्स (NYT) की एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे विवाद के केंद्र में '21 मई का वो ज्ञापन' था, जिसने विशेष रूप से F-1 छात्र वीजा और पर्यटक वीजा धारकों की नींद उड़ा दी थी। छात्रों को डर था कि पढ़ाई पूरी होने के बाद उनके स्थायी निवास के आवेदन लंबित होने के बावजूद उन्हें जबरन देश छोड़ने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
लेकिन जैसे ही अमेरिकी इकॉनमी और कॉर्पोरेट जगत से दबाव बढ़ा, होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट (DHS) ने डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरू कर दी। विभाग ने अब साफ किया है कि नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है और पुराना संदेश एक "गलतफहमी" जैसा था। इमिग्रेशन अधिकारियों के पास हमेशा से यह विवेक रहा है कि वे हर मामले के आधार पर यह तय कर सकें कि किसे देश में रखना है और किसे बाहर भेजना है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सस्पेंस अमेरिका में रहने वाले भारतीय समुदाय को लेकर था। चूंकि अमेरिका के कुल H-1B वीजा प्राप्तकर्ताओं में भारतीयों की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत है, इसलिए इस 'घर वापसी' के नियम का सबसे घातक असर भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स पर पड़ने वाला था।
लेकिन इमिग्रेशन विशेषज्ञों ने राहत की सांस लेते हुए बताया कि इस संशोधित ढांचे के तहत H-1B कर्मचारियों को पर्याप्त सुरक्षा मिलने की उम्मीद है। इसका मुख्य कारण H-1B कार्यक्रम का "दोहरा उद्देश्य" (Dual Intent) का सिद्धांत है। यह कानूनी प्रावधान वीजा धारकों को संयुक्त राज्य अमेरिका में अस्थायी रूप से काम करने के साथ-साथ एक ही समय में स्थायी निवास (ग्रीन कार्ड) के लिए भी आवेदन करने की कानूनी अनुमति देता है। इस मजबूत कानूनी कवच के कारण भारतीय टेक कर्मचारी ग्रीन कार्ड प्रक्रिया की किसी भी कठोर व्याख्या से सुरक्षित बच निकले हैं।
भले ही DHS के प्रवक्ता ने अब यह कहकर संदेश को नरम कर दिया है कि "स्थिति मोटे तौर पर अपरिवर्तित ही रहेगी," लेकिन प्रवासियों के मन से डर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अधिकारियों ने चालाकी से एक नया क्लॉज जोड़ दिया है कि जो आवेदक "आर्थिक लाभ प्रदान करते हैं या राष्ट्रीय हित में हैं," उन्हें उनके मामलों पर कार्रवाई पूरी होने तक अमेरिका में रहने की अनुमति दी जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ने इस यू-टर्न के जरिए कॉर्पोरेट अमेरिका की नाराजगी मोल लेने से खुद को बचा लिया है, लेकिन इमिग्रेशन अधिकारियों के हाथों में 'व्यक्तिगत विवेक' की शक्ति देकर उन्होंने एक अदृश्य तलवार हमेशा के लिए प्रवासियों के सिर पर लटका दी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में ग्राउंड लेवल पर ग्रीन कार्ड के आवेदनों को किस तरह आंका जाता है।
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