
Euthanasia Laws India vs World: गाजियाबाद के हरीश राणा अब इस दुनिया में नहीं हैं। 13 साल तक कोमा में रहने के बाद, कल 24 मार्च को दिल्ली एम्स में उन्होंने आखिरी सांस ली। आज सुबह दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार हुआ। हरीश भारत के पहले ऐसे व्यक्ति बने जिन्हें 'पैसिव यूथेनेशिया' यानी सम्मान के साथ मौत (इच्छामृत्यु) का कानूनी हक मिला। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस इच्छामृत्यु को भारत में सुप्रीम कोर्ट ने हरीश के लिए सही माना, उसी के लिए दुनिया के कई देशों में कड़ी सजा का प्रावधान है? आइए जानते हैं कि मौत के इस अधिकार को लेकर दुनिया के अलग-अलग देशों में क्या नियम हैं...
भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में इच्छामृत्यु को लेकर कानून बेहद सख्त है। यहां यूथेनेशिया किसी भी रूप में वैध नहीं है। अगर कोई डॉक्टर या परिवार का सदस्य इसमें मदद करता है या इसे बढ़ावा देता है, तो उसे 'कालकोठरी' यानी 14 साल तक की जेल की सजा भुगतनी पड़ सकती है।
रूस में चाहे एक्टिव (इंजेक्शन देकर मारना) हो या पैसिव (इलाज रोककर मारना), दोनों ही तरीके पूरी तरह अवैध हैं। यहां कानून इतना कड़ा है कि अगर कोई डॉक्टर दया दिखाते हुए मरीज का इलाज रोक देता है या उसे मौत की दवा देता है, तो उस डॉक्टर को कड़ी सजा और भारी जुर्माना भरना पड़ता है।
अमेरिका में मामला थोड़ा पेचीदा है। पूरे देश में 'एक्टिव यूथेनेशिया' गैर-कानूनी है, लेकिन वाशिंगटन डीसी जैसे 12 राज्यों में कोर्ट ने 'मेडिकल एड इन डाइंग' को मंजूरी दी है। इसका मतलब है कि लाइलाज बीमारी वाले मरीज को डॉक्टर ऐसी दवा दे सकते हैं जिससे वह अपनी तकलीफ को हमेशा के लिए खत्म कर सके।
चीन में लंबे समय तक इसे 'हत्या' माना जाता था, लेकिन 2022 में एक खास केस के बाद नियमों में ढील दी गई। अब वहां 'पैसिव यूथेनेशिया' को कुछ शर्तों के साथ इजाजत मिल गई है, यानी अगर बचने की उम्मीद न हो तो लाइफ सपोर्ट हटाया जा सकता है।
ईरान, तुर्की, जॉर्डन, मिस्र, लेबनान और इराक जैसे देशों में इच्छामृत्यु का ख्याल भी पाप और अपराध माना जाता है। यहां यह पूरी तरह से प्रतिबंधित है। हालांकि, इजराइल, सऊदी अरब और यूएई में 'पैसिव यूथेनेशिया' पर कोर्ट के फैसलों या सख्त शर्तों के आधार पर विचार किया जा सकता है, लेकिन 'एक्टिव' मौत यहां भी कत्ल मानी जाती है।
भारत में 'एक्टिव यूथेनेशिया' (जहर का इंजेक्शन देना) पूरी तरह गैर-कानूनी है और इसे 'हत्या' या 'आत्महत्या में मदद' माना जाता है, लेकिन हरीश के केस में 'पैसिव यूथेनेशिया' का पालन किया गया। इसका सीधा सा मतलब है अगर कोई मरीज वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब (खाने की नली) के सहारे ही जिंदा है और उसके ठीक होने की जीरो परसेंट गुंजाइश है, तो उसे उस 'मशीनी जिंदगी' से आजाद कर दिया जाए ताकि उसकी मौत प्राकृतिक रूप से हो सके।
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