Harish Rana Case: सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर, मां-बाप की दर्द भरी बात सुन नम हो जाएंगी आंखें

Published : Mar 11, 2026, 04:11 PM IST

Harish Rana Parents Reaction: गाजियाबाद के हरीश राणा पिछले 13 साल से कोमा में थे। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी है। फैसले के बाद हरीश के माता-पिता की प्रतिक्रिया सामने आई है, जिसने इस पूरे मामले को और भी मार्मिक बना दिया है।

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर मां-बाप की बात सुन भर आएंगी आंखें

कभी सपनों से भरी जिंदगी जीने वाला एक होनहार छात्र, और फिर एक हादसा जिसने सब कुछ बदल दिया। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा पिछले 13 साल से कोमा की हालत में बिस्तर पर पड़े हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उन्हें इच्छा मृत्यु देने की अनुमति दे दी है।

कोर्ट के फैसले के बाद हरीश राणा को लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसके बाद उन्हें मृत घोषित किया जाएगा। यह फैसला सुनना हरीश के माता-पिता के लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने कहा कि बेटे की हालत देखकर अब यही सबसे मानवीय रास्ता बचा था।

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मां की बात सुनकर भर आईं सबकी आंखें

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब मीडिया ने हरीश की मां से बात की तो वह भावुक हो गईं। रोते हुए उन्होंने कहा, “क्या ही बताएं... मां-बाप को कैसा लगता होगा। हम कुछ नहीं बोल सकते।” उनकी यह छोटी सी बात ही इस पूरे दर्द को बयान कर देती है, जिसे परिवार पिछले 13 साल से झेल रहा है। हालांकि परिवार ने कोर्ट के फैसले पर संतोष जताया है। उनका कहना है कि उन्होंने यह फैसला मजबूरी में लिया है।

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पिता बोले – कौन मां-बाप अपने बेटे के लिए ऐसा चाहेंगे

हरीश के पिता अशोक राणा ने भी अपनी पीड़ा जाहिर की। उन्होंने कहा कि पिछले तीन साल से वे इस मामले को लेकर कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे थे। उन्होंने कहा, “कौन से मां-बाप अपने बेटे के लिए ऐसा चाहेंगे? लेकिन उसकी हालत देखकर हमें यही रास्ता चुनना पड़ा। अब उसे एम्स ले जाया जाएगा।” पिता ने यह भी बताया कि हरीश पढ़ाई में बहुत होनहार था और पंजाब यूनिवर्सिटी में टॉपर रहा था।

यह घटना साल 2013 की है। उस समय हरीश राणा चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रहे थे। इसी दौरान वह अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए। इस हादसे में उनके सिर पर गंभीर चोट आई थी। इसके बाद से ही हरीश कोमा में चले गए। डॉक्टरों ने उन्हें 100 फीसदी दिव्यांग घोषित कर दिया था। कई साल तक इलाज चलता रहा, लेकिन हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।

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इलाज की उम्मीद खत्म होने लगी थी

परिवार ने हरीश के इलाज के लिए कई अस्पतालों में कोशिश की। डॉक्टरों से सलाह ली और हर संभव इलाज करवाया। लेकिन धीरे-धीरे डॉक्टरों ने भी उम्मीद छोड़नी शुरू कर दी थी। लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहने के कारण हरीश के शरीर पर गहरे घाव भी बनने लगे थे। बेटे की यह हालत देखकर माता-पिता के लिए हर दिन एक नई पीड़ा जैसा था। इसी वजह से उन्होंने कोर्ट में इच्छा मृत्यु की मांग की।

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सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट और सलाह के बाद लिया फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला देने से पहले सभी पहलुओं को ध्यान से देखा। एम्स की मेडिकल रिपोर्ट, डॉक्टरों के पैनल की राय, परिवार की बात और केंद्र सरकार का पक्ष सुनने के बाद कोर्ट ने यह फैसला दिया। कोर्ट ने साफ किया कि हरीश को अब एम्स के पेलिएटिव केयर विभाग में ले जाया जाएगा। वहां नियमों के तहत धीरे-धीरे मेडिकल ट्रीटमेंट हटाया जाएगा, ताकि उन्हें कम से कम पीड़ा हो।

हरीश राणा का मामला सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि एक परिवार की सबसे कठिन मंजूरी की कहानी है। 13 साल तक बेटे को उम्मीद के सहारे संभालने वाले माता-पिता के लिए यह फैसला शायद सबसे भारी रहा होगा।लेकिन उनके शब्दों में एक ही बात साफ दिखाई देती है, कभी-कभी किसी अपने को दर्द से मुक्ति देना ही सबसे कठिन लेकिन सबसे मानवीय फैसला बन जाता है।

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