
नई दिल्ली: फरवरी 2020 का वह महीना दिल्ली के इतिहास में एक ऐसा काला धब्बा बन गया, जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकता। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के नाम पर भड़की नफरत की आग ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली को श्मशान बना दिया था। चांद बाग, मुस्तफाबाद और खजूरी खास जैसे इलाकों में जलती गाड़ियां, पत्थरों की बारिश और गूंजती गोलियों के बीच एक ऐसी खौफनाक वारदात को अंजाम दिया गया, जिसने पूरी इंसानियत को शर्मसार कर दिया। इसी दंगे का शिकार हुए इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के एक युवा अधिकारी की यह कहानी आज भी रोंगटे खड़े करने वाली है। जिसकी वफादारी का इनाम उसे मौत के रूप में मिला।
The conspiracy to murder IB officer Ankit Sharma was hatched at the home of the immediate AAP Councilor Tahir Hussain Under the guise of #DelhiRiots2020
Seizing the opportunity, #TahirHussain's henchmen went to #AnkitSharma's home, dragged him to a drain, & brutally murdered him. pic.twitter.com/g06nnutLON— WORLD NEWS ANALYST (@TIgerNS3) July 13, 2026
25 फरवरी 2020 की वह शाम बेहद सर्द और डरावनी थी। 26 साल के युवा IB अधिकारी अंकित शर्मा अपनी ड्यूटी खत्म कर घर लौटे थे। घर के बाहर चारों तरफ चीख-पुकार मची थी और हवा में बारूद की गंध थी। माहौल की संवेदनशीलता को देखते हुए, एक जिम्मेदार अधिकारी के तौर पर अंकित से चुप नहीं बैठा गया। चश्मदीदों के मुताबिक, वह अपने इलाके में भड़की भीड़ को शांत करने और लोगों को समझाने के लिए घर से बाहर निकले थे। लेकिन अंकित इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि वह सीधे साक्षात मौत के जाल में कदम रख रहे हैं। चंद कदमों की दूरी पर, आम आदमी पार्टी (AAP) के तत्कालीन पार्षद और नेता ताहिर हुसैन के घर और एक स्थानीय मस्जिद के पास दंगाई हथियारों से लैस होकर कत्लेआम मचाने को तैयार खड़े थे।
#WATCH | On Delhi's Karkardooma court convicting former AAP councillor Tahir Hussain in the Intelligence Bureau (IB) Ankit Sharma murder case, Delhi Government Law & Justice Minister Kapil Mishra says, "Today it has been proven that the 2020 riots were a premeditated conspiracy,… pic.twitter.com/Pfpv3KmB1G
— ANI (@ANI) July 13, 2026
अंकित शर्मा जैसे ही उस हिंसक भीड़ के करीब पहुंचे, दंगाइयों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। वह पीछे हटने की कोशिश करते, उससे पहले ही उपद्रवियों ने उन्हें दबोच लिया और घसीटते हुए ताहिर हुसैन के घर के भीतर ले गए। उसके बाद जो हुआ, उसकी कल्पना मात्र से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अगले दिन यानी 26 फरवरी को, अंकित के पिता रविंदर कुमार (जो खुद एक पूर्व पुलिस अधिकारी थे) अपने लापता बेटे को ढूंढते हुए एक नाले के पास पहुंचे। स्थानीय लोगों और गोताखोरों की मदद से नाले के कीचड़ से एक क्षत-विक्षत शव निकाला गया-वह शव अंकित का था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट जब सामने आई, तो डॉक्टरों के भी हाथ काँप गए। अंकित के शरीर पर चाकू और धारदार हथियारों से 51 बार बेरहमी से वार किए गए थे। दंगाइयों ने उनके फेफड़ों और दिमाग को इस कदर छलनी कर दिया था कि अत्यधिक खून बहने से मौके पर ही उनकी मौत हो गई। पहचान छुपाने और सबूत मिटाने के लिए लाश को नाले में फेंक दिया गया था।
इस जघन्य हत्याकांड के 6 साल बाद, अदालत ने इस खूनी खेल के किरदारों को उनके अंजाम तक पहुंचा दिया है। दिल्ली की एक स्थानीय अदालत ने मुख्य आरोपी और पूर्व AAP नेता ताहिर हुसैन समेत पांच लोगों-जावेद, अनस, नाज़िम और कासिम-को अंकित शर्मा की हत्या और दंगा भड़काने का दोषी करार दिया है। अदालत ने सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष के उन दावों को सही पाया, जिसमें कहा गया था कि ताहिर हुसैन ने अपने घर की छत से भीड़ को उकसाया था और नारा दिया था कि "इन्हें बख्शना मत"। हालांकि, कोर्ट ने इन्हें आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) के आरोप से बरी कर दिया और सबूतों के अभाव में 6 अन्य लोगों को रिहा कर दिया। इस फैसले ने भले ही पीड़ित परिवार को कानूनी तसल्ली दी हो, लेकिन 51 घावों की वो टीस आज भी दिल्ली के सीने में दफन है।
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