बांकीपुर और दतिया उपचुनाव में हार के बाद बीजेपी आत्ममंथन की तैयारी में है। पार्टी हार के कारणों, उम्मीदवार चयन और वोट बैंक में बदलाव का विश्लेषण करेगी।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए लगातार दूसरे सप्ताह राजनीतिक मोर्चे पर बुरी खबर आई। पिछले सप्ताह पेपर लीक मामले को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था। वहीं, अब बीजेपी के लिए नए हफ्ते की शुरुआत बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में हार के साथ हुई है। दोनों राज्यों में बीजेपी की सरकार होने के बावजूद पार्टी इन सीटों को नहीं बचा सकी। ऐसे में इन नतीजों को राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।

BJP के लिए उपचुनाव में हार क्यों मानी जा रही है बड़ी बात?

आमतौर पर उपचुनावों में सत्तारूढ़ दल को बढ़त मिलती है। इसका उदाहरण गुजरात की मंजलपुर विधानसभा सीट रही, जहां बीजेपी ने बड़ी जीत दर्ज की। ऐसे माहौल में बिहार की बांकीपुर और एमपी की दतिया जैसी सीटों पर हार पार्टी के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है।

बांकीपुर में 35 साल पुराना गढ़ नहीं बचा सकी बीजेपी

बिहार की बांकीपुर सीट पर बीजेपी को सबसे बड़ा झटका लगा। पिछले चुनाव में पार्टी ने यह सीट 50 हजार से अधिक वोटों के अंतर से जीती थी, लेकिन इस बार जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने जीत हासिल कर राजनीतिक समीकरण बदल दिए। इस जीत के साथ प्रशांत किशोर पहली बार बिहार विधानसभा पहुंचे और जन सुराज पार्टी को भी विधानसभा में प्रतिनिधित्व मिला।

BJP करेगी बूथ स्तर पर हार की समीक्षा

बीजेपी नेताओं का कहना है कि पार्टी हार का विस्तृत विश्लेषण करेगी। बूथ स्तर पर यह देखा जाएगा कि किन क्षेत्रों में वोटों का नुकसान हुआ और किस वजह से चुनावी परिणाम बदले। पार्टी के शुरुआती आकलन में यह माना जा रहा है कि राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के वोटों का एक हिस्सा प्रशांत किशोर के पक्ष में गया। बताया जा रहा है कि आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने सीमित समय के लिए प्रचार किया, लेकिन इसके बावजूद वोटों का समीकरण बदला।

RJD और प्रशांत किशोर पर लगाए आरोप

बीजेपी के कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि आरजेडी और प्रशांत किशोर के बीच राजनीतिक समझ बनी हुई थी। उनका दावा है कि आरजेडी ने अपने पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखते हुए बीजेपी के सवर्ण वोटों में सेंध लगाने की रणनीति अपनाई। पिछले चुनाव में आरजेडी उम्मीदवार को 46 हजार से अधिक वोट मिले थे, जबकि इस बार पार्टी 15 हजार वोटों का आंकड़ा भी पार नहीं कर सकी।

उम्मीदवार बदलने का फैसला भी बना चर्चा का विषय

बीजेपी के भीतर यह भी माना जा रहा है कि उम्मीदवार बदलने के फैसले का असर चुनाव पर पड़ा। कुछ नेताओं का मानना है कि इससे मतदाताओं के बीच गलत संदेश गया और पार्टी के पारंपरिक वोटरों का एक वर्ग नाराज हो गया। पार्टी ने इस सीट पर प्रचार की जिम्मेदारी स्थानीय नेताओं को दी थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी कई बार क्षेत्र का दौरा किया, लेकिन इसके बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।

युवाओं की नाराजगी और स्थानीय मुद्दों का असर

पार्टी के भीतर यह भी चर्चा है कि NEET पेपर लीक विवाद, UGC से जुड़े मुद्दे, भरत तिवारी एनकाउंटर और छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों का असर चुनाव पर पड़ा। बिहार के कई हिस्सों में हुए छात्र आंदोलनों और पुलिस कार्रवाई को भी कुछ नेता चुनावी नतीजों से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि, बीजेपी ने आधिकारिक तौर पर इन कारणों को हार की वजह नहीं माना है।

दतिया की हार से बढ़ीं मध्य प्रदेश में चुनौतियां

मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर मिली हार को भी बीजेपी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इससे मुख्यमंत्री मोहन यादव पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। साथ ही, पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की भूमिका भी चर्चा में है। टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर की थी। बाद में उन्होंने पार्टी के लिए प्रचार किया, लेकिन चुनाव परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। रिपोर्ट्स के अनुसार, पार्टी को उनके स्थानीय पोलिंग बूथ पर भी हार का सामना करना पड़ा।

बीजेपी करेगी आत्ममंथन

उपचुनाव के इन नतीजों के बाद बीजेपी के भीतर आत्ममंथन की तैयारी शुरू हो गई है। पार्टी नेताओं का कहना है कि संगठन को जमीनी स्तर के मुद्दों पर और अधिक ध्यान देना होगा। साथ ही युवाओं की अपेक्षाओं, स्थानीय समस्याओं और उम्मीदवार चयन जैसे विषयों पर भी गंभीरता से काम करने की जरूरत है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि आने वाले समय में सरकार और पार्टी संगठन दोनों स्तरों पर कुछ महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं।