
नई दिल्ली: भारत में कैंसर से जंग लड़ रहे लाखों मरीजों और उनके परिवारों के लिए एक बेहद संवेदनशील और डरा देने वाली खबर सामने आई है। देश के अस्पतालों में जीवन रक्षक कीमोथेरेपी दवाओं का स्टॉक लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। इस अभूतपूर्व संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिसने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में मचे हड़कंप को सरेआम उजागर कर दिया है। सरकार ने कैंसर के इलाज की सबसे मुख्य दवाओं—सिसप्लेटिन (Cisplatin) और कार्बोप्लेटिन (Carboplatin) की कीमतों को अचानक बढ़ाने की हरी झंडी दे दी है। इस फैसले ने पहली बार आधिकारिक तौर पर यह साबित कर दिया है कि देश के कैंसर अस्पताल इस समय एक भयावह संकट से जूझ रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे का सस्पेंस तब खुला जब राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स (News18) के जरिए एक बेहद गोपनीय सरकारी चिट्ठी सामने आई। डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्यूटिकल्स (DoP) ने 7 जून 2026 को नेशनल फार्मास्यूटिकल्स प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के मेंबर सेक्रेटरी को एक इमरजेंसी पत्र लिखा।
इस पत्र के अनुसार, रसायन और उर्वरक मंत्री ने ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 के 'पैरा 19' को लागू करने की 'सैद्धांतिक मंज़ूरी' दे दी है। आपको बता दें कि 'पैरा 19' सरकार का वो ब्रह्मास्त्र या विशेष अधिकार है, जिसका इस्तेमाल केवल तब किया जाता है जब देश में किसी बेहद जरूरी दवा की उपलब्धता पूरी तरह खतरे में आ जाए। यह नियम आम कीमत-नियंत्रण व्यवस्था को ताक पर रखकर कंपनियों को रेट बढ़ाने की छूट देता है।
आखिर सरकार को ऐसा कड़ा कदम क्यों उठाना पड़ा? इसके पीछे एक इंटर-मिनिस्टीरियल कमेटी (IMC) की गहन और गुप्त जांच रिपोर्ट है। कमेटी के सामने दवा कंपनियों ने 82 ऐसी दवाओं की लिस्ट सौंपी थी, जिनकी उत्पादन लागत बढ़ने के कारण उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग बंद करने की धमकी दी थी। गहन समीक्षा के बाद, कमेटी ने 78 दवाओं को होल्ड पर डाल दिया, लेकिन 4 दवाओं को अत्यंत जीवन रक्षक माना।
इनमें कार्बोप्लेटिन और सिसप्लेटिन इंजेक्शन शामिल थे। इस फैसले के पीछे देश के सबसे प्रतिष्ठित टाटा मेमोरियल कैंसर हॉस्पिटल की वह गंभीर चेतावनी थी, जिसमें कहा गया था कि अगर इन दवाओं की सप्लाई तुरंत बहाल नहीं हुई, तो अस्पतालों में हाहाकार मच जाएगा। ये दोनों इंजेक्शन कई तरह के कैंसर (जैसे फेफड़े, डिम्बग्रंथि और स्तन कैंसर) के इलाज में 'फर्स्ट-लाइन' यानी सबसे पहली और अनिवार्य कीमोथेरेपी के रूप में इस्तेमाल होते हैं।
इस किल्लत के पीछे की आर्थिक साज़िश बेहद चौंकाने वाली है। कंपनियों ने सरकार के सामने तर्क दिया कि इन दवाओं को बनाने वाले कच्चे माल यानी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट (API) की कीमतों में दुनिया भर में भारी उछाल आया है। इसके अलावा विदेशी मुद्रा विनिमय दरों (डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति) में उतार-चढ़ाव और बढ़ती उत्पादन लागत के कारण उन्हें इन दवाओं को बेचने में भारी घाटा हो रहा था।
नतीजतन, कंपनियों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत इन दवाओं का उत्पादन ही बंद कर दिया। यानी मरीजों की जिंदगी दांव पर थी और दवा लॉबी अपने मुनाफे के लिए अड़ी हुई थी। अब जब सरकार ने घुटने टेकते हुए कीमतें बढ़ाने की मंजूरी दे दी है, तब जाकर कंपनियों ने दोबारा प्रोडक्शन शुरू करने की बात कही है।
अब सबसे बड़ा सस्पेंस और डर इस बात को लेकर है कि कैंसर के इलाज का खर्च कितना बढ़ जाएगा? सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, मंत्रालय ने प्राइसिंग अथॉरिटी को जो फॉर्मूला सुझाया है, उसके तहत पिछली बार तय हुई कीमत के बाद से हर साल 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जा सकती है, जिसकी अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय की गई है। हालांकि, अंतिम रेट तय करने से पहले कच्चे माल की लागत की दोबारा जांच की जा रही है। लेकिन यह साफ है कि आने वाले दिनों में कैंसर का इलाज मध्यमवर्गीय परिवारों की पहुंच से और दूर होने वाला है।
देश भर के बड़े ऑन्कोलॉजिस्ट (कैंसर विशेषज्ञों) ने बेहद डरावने खुलासे किए हैं। दवाओं की कमी के कारण मरीजों की कीमोथेरेपी के तय शेड्यूल टूट रहे हैं, उनकी डोज कम करनी पड़ रही है और इलाज में हफ्तों की देरी हो रही है, जिससे कैंसर के फैलने का खतरा दोगुना हो गया है। डॉक्टरों को मजबूरन इन प्लेटिनम एजेंट दवाओं की जगह दूसरे महंगे और कम असरदार विकल्पों का सहारा लेना पड़ रहा है। सरकार के इस दखल के बाद क्या बाजार में दवाएं तुरंत वापस आ पाएंगी या मरीजों को अभी और इंतजार करना होगा? यह सस्पेंस अभी भी बरकरार है।
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