
नई दिल्लीः पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच आम लोगों के लिए एक राहत की खबर है. सरकारी सूत्रों ने साफ किया है कि भारत में फिलहाल पेट्रोल या डीजल के दाम बढ़ाने की कोई योजना नहीं है. देश के पास अभी पर्याप्त तेल का भंडार मौजूद है. ANI ने सूत्रों के हवाले से बताया, “भारत के पास 25 दिनों का कच्चा तेल और रिफाइंड तेल का स्टॉक है. कच्चे तेल, LPG और LNG के आयात के लिए दूसरे सोर्स भी तलाशे जा रहे हैं. सरकारी सूत्रों के मुताबिक, पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने की अभी कोई योजना नहीं है.”
जब दुनिया भर की सुर्खियों में ईरान और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर चिंता छाई हुई है, तब नई दिल्ली का संदेश साफ है: घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है, कम से कम अभी तो नहीं.
एक आम भारतीय के लिए, ग्लोबल टेंशन के समय सबसे बड़ी चिंता यही होती है कि क्या रातों-रात पेट्रोल और डीजल महंगे हो जाएंगे? अधिकारियों के मुताबिक, भारतीय रिफाइनरियों के पास फिलहाल इतना कच्चा तेल है कि वे कम से कम 10 दिनों की ज़रूरतें पूरी कर सकती हैं. इसके अलावा, फ्यूल स्टॉक से 5-7 दिन और काम चल सकता है. इन सबको स्ट्रैटेजिक रिज़र्व (आपातकालीन भंडार) के साथ मिला दें, तो यह करीब 25 दिनों का बफर बन जाता है. आसान शब्दों में कहें तो, अगर तेल की शिपमेंट कुछ समय के लिए धीमी भी हो जाती है, तो भी देश भर के पंप जल्द ही खाली नहीं होंगे.
असली चिंता हज़ारों किलोमीटर दूर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है. यह एक संकरा समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया का करीब 20 फीसदी पेट्रोलियम लिक्विड और लगभग पांचवां हिस्सा LNG गुज़रता है. भारत के लिए तो यह और भी ज़्यादा ज़रूरी है. भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग आधा हिस्सा, यानी रोज़ाना करीब 25 से 27 लाख बैरल तेल इसी रास्ते से आता है. यह तेल मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, UAE और कुवैत से आता है. भारत के करीब 60% LNG और लगभग सभी LPG शिपमेंट भी इसी रास्ते से गुज़रते हैं. यही वजह है कि इस इलाके में ज़रा सी भी हलचल होते ही दुनिया के तेल बाज़ारों में खलबली मच जाती है.
सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है. अधिकारी अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और रूस जैसे दूसरे सप्लायर्स से भी संपर्क साध रहे हैं. इस पूरी कवायद का मकसद किसी एक रास्ते पर निर्भरता कम करना और अचानक आने वाली किसी भी रुकावट के लिए तैयार रहना है.
भले ही सप्लाई अभी सुरक्षित लग रही है, लेकिन कीमतों का मामला अलग है. ब्रेंट क्रूड हाल ही में 73 डॉलर प्रति बैरल के करीब बंद हुआ, जो सात महीने का सबसे ऊंचा स्तर है. इस साल बढ़ते जियोपॉलिटिकल टेंशन के चलते इसमें 12 डॉलर से ज़्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है. ट्रेडर्स पहले से ही उतार-चढ़ाव मानकर चल रहे हैं. कुछ अनुमानों के मुताबिक, अगर सप्लाई का खतरा बढ़ा तो कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल की तरफ जा सकती हैं. हालांकि, सरकारी सूत्रों ने यह साफ कर दिया है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाने की अभी कोई योजना नहीं है.
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