
दुनिया तेजी से बदल रही है और भारत भी। आज भारत सिर्फ आबादी के दम पर नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी, स्पेस, डिजिटल इकोनॉमी और ग्लोबल कूटनीति के दम पर दुनिया की सबसे ताकतवर आवाजों में शामिल हो चुका है। भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बना रही हैं, भारतीय मूल के सीईओ दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों का नेतृत्व कर रहे हैं और ISRO अंतरिक्ष में नए रिकॉर्ड बना रहा है।
लेकिन इन सबके बावजूद पश्चिमी मीडिया का एक हिस्सा आज भी भारत को उसी पुराने चश्मे से देखने की कोशिश करता नजर आता है, जिसमें भारत को ‘सपेरों’, ‘जादू-टोने’ और पिछड़ेपन से जोड़कर दिखाया जाता रहा है। नॉर्वे के एक अखबार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘सपेरे’ के रूप में दिखाने वाले कार्टून ने इसी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है।
नॉर्वे के बड़े अखबार ‘आफ़्टेनपोस्टेन’ में प्रकाशित एक कार्टून में पीएम नरेंद्र मोदी को सपेरे के रूप में दिखाया गया। सांप की जगह पेट्रोल पाइप को दर्शाया गया था। इस कार्टून के साथ एक संपादकीय भी प्रकाशित किया गया, जिसके बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इसे भारत का अपमान बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक कार्टून नहीं, बल्कि भारत को लेकर पश्चिमी मानसिकता का प्रतिबिंब है। सोशल मीडिया पर भी बड़ी संख्या में लोगों ने इसे नस्लवादी और औपनिवेशिक सोच का उदाहरण बताया।
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यह सवाल इसलिए बड़ा हो जाता है क्योंकि आज का भारत 20-30 साल पहले वाला भारत नहीं है। भारत आज दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। डिजिटल पेमेंट में भारत दुनिया का नेतृत्व कर रहा है। UPI मॉडल को कई देश अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। भारतीय आईटी सेक्टर दुनिया की टेक इंडस्ट्री की रीढ़ बन चुका है।
गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, IBM जैसी कंपनियों के शीर्ष पदों पर भारतीय मूल के लोग बैठे हैं। स्पेस सेक्टर में भारत ने चंद्रयान और आदित्य मिशन के जरिए दुनिया को चौंकाया। कम लागत में सफल स्पेस मिशन भारत की पहचान बन चुके हैं। मेड इन इंडिया टेक्नोलॉजी अब सिर्फ नारा नहीं, बल्कि वैश्विक वास्तविकता बनती जा रही है। इसके बावजूद जब पश्चिमी मीडिया भारत को सपेरों या पिछड़े समाज की तरह दिखाता है, तो यह सिर्फ व्यंग्य नहीं रह जाता, बल्कि मानसिकता पर सवाल खड़े करता है।
यह पहली बार नहीं है जब भारत को लेकर ऐसे चित्रण सामने आए हों। 2024 में अमेरिका के एक वेब कॉमिक में भारतीय क्रू मेंबर्स को बेहद आपत्तिजनक तरीके से दिखाया गया था, जब बाल्टीमोर ब्रिज हादसा हुआ था। इससे पहले जर्मन मैगजीन ‘डेर स्पीगल’ ने भारत और चीन की तुलना करते हुए भारतीयों को भीड़भाड़ और अव्यवस्था से जोड़कर दिखाया था।
2014 में न्यूयॉर्क टाइम्स को भी भारत के स्पेस मिशन पर एक विवादित कार्टून के बाद माफी मांगनी पड़ी थी। उस कार्टून में भारत को एक ग्रामीण और पिछड़े देश की तरह दिखाया गया था, जो “एलिट स्पेस क्लब” का दरवाजा खटखटा रहा है।इतिहास देखें तो ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर में भी भारतीयों को अक्सर सांप-सपेरों, अंधविश्वास और गरीबी के प्रतीक के रूप में दिखाया जाता था। विशेषज्ञ मानते हैं कि उस दौर की कई रूढ़िवादी छवियां आज भी पश्चिमी मीडिया के कुछ हिस्सों में मौजूद हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। पहला कारण औपनिवेशिक मानसिकता है। दशकों तक पश्चिमी देशों ने एशियाई और अफ्रीकी देशों को “कमतर” दिखाने वाली छवियां गढ़ीं। दूसरा कारण भारत का तेजी से उभरना भी माना जाता है। जिस देश को कभी विकासशील और कमजोर अर्थव्यवस्था कहा जाता था, वही आज वैश्विक सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी, फार्मा और स्पेस सेक्टर में बड़ी ताकत बन चुका है। तीसरा कारण सांस्कृतिक पूर्वाग्रह भी हो सकता है। पश्चिमी समाज का एक हिस्सा अब भी भारत को उसी पुराने फ्रेम में देखने का आदी है, जिसमें गरीबी, भीड़ और सांप-सपेरे जैसी छवियां शामिल थीं।
हालांकि तस्वीर पूरी तरह एक जैसी नहीं है। दुनिया का बड़ा हिस्सा अब भारत को नई नजर से देख रहा है। G20 की मेजबानी से लेकर डिजिटल इंडिया मॉडल तक, भारत की वैश्विक छवि मजबूत हुई है। विदेशी निवेश बढ़ा है और भारत को भविष्य की आर्थिक शक्ति के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि सोशल मीडिया और वैश्विक मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारत को लेकर पुराने स्टीरियोटाइप अब भी समय-समय पर सामने आ जाते हैं। यही वजह है कि हर ऐसे विवाद के बाद भारत में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।
आज का भारत AI, सेमीकंडक्टर, स्पेस टेक्नोलॉजी, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और स्टार्टअप इकोसिस्टम की बात करता है। भारत की युवा आबादी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। ऐसे समय में अगर कोई देश या मीडिया संस्थान भारत को सिर्फ “सपेरों का देश” दिखाने की कोशिश करता है, तो यह बहस सिर्फ एक कार्टून तक सीमित नहीं रहती। यह उस सोच पर सवाल बन जाती है, जो बदलते भारत को अब भी पुराने नजरिए से देखना चाहती है।
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