Saudi-UAE vs America: ईरान पर हमले को लेकर अमेरिका को सऊदी अरब और UAE से बड़ा झटका लगा है। दोनों देशों ने ट्रंप के सैन्य प्लान का विरोध किया और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड से 15 अरब डॉलर निकाल लिए। जानिए कैसे बढ़ सकता है अमेरिका पर आर्थिक दबाव।

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका को उसके सबसे करीबी सहयोगियों से ही बड़ा झटका लगा है। ईरान के साथ टकराव के माहौल में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने ऐसे कदम उठाए हैं, जिनसे वॉशिंगटन की रणनीति और आर्थिक ताकत दोनों पर सवाल खड़े हो गए हैं। एक तरफ दोनों देशों ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड से अरबों डॉलर निकालने शुरू कर दिए हैं, वहीं दूसरी ओर ईरान पर संभावित हमले का समर्थन करने से भी साफ इनकार कर दिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि अमेरिका ईरान पर सैन्य कार्रवाई से सिर्फ “एक घंटे दूर” था, लेकिन आखिरी समय में फैसला टाल दिया गया। माना जा रहा है कि सऊदी अरब और यूएई के रुख ने इस फैसले में बड़ी भूमिका निभाई।

24 घंटे में अमेरिका को दो बड़े झटके

अमेरिका को पहला झटका आर्थिक मोर्चे पर लगा। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक सऊदी अरब ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी 10.8 बिलियन डॉलर घटा दी है। इसके बाद अमेरिकी ट्रेजरी में सऊदी की कुल हिस्सेदारी 149.6 बिलियन डॉलर रह गई है। वहीं संयुक्त अरब अमीरात ने भी 5.8 बिलियन डॉलर निकाल लिए हैं। अब अमेरिकी कोष में यूएई की हिस्सेदारी 114.1 बिलियन डॉलर बची है। दोनों देशों ने मिलकर करीब 15 अरब डॉलर की राशि अमेरिकी ट्रेजरी सिस्टम से बाहर निकाली है। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब अमेरिका पहले से बढ़ते कर्ज, ऊंची ब्याज दरों और वैश्विक तनाव के दबाव से जूझ रहा है।

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ट्रेजरी बॉन्ड से पैसा निकालना क्यों माना जा रहा बड़ा संकेत?

अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड दुनिया की सबसे सुरक्षित निवेश व्यवस्था मानी जाती है। अमेरिका इन्हीं बॉन्ड्स के जरिए दुनिया भर के देशों और निवेशकों से पैसा जुटाता है और उसी रकम का इस्तेमाल विकास योजनाओं, रक्षा खर्च और आर्थिक गतिविधियों में करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बड़े तेल उत्पादक देश लगातार अमेरिकी बॉन्ड से पैसा निकालते हैं, तो इससे वैश्विक निवेशकों के भरोसे पर असर पड़ सकता है। डॉलर की मजबूती भी दबाव में आ सकती है और अमेरिका के लिए कर्ज लेना महंगा हो सकता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेजरी बॉन्ड से निकासी बढ़ने पर अमेरिका को ज्यादा ब्याज दरों पर कर्ज उठाना पड़ सकता है। ऐसे में अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ बढ़ने की आशंका है।

ईरान पर हमले के खिलाफ क्यों हुए सऊदी और UAE?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पर गंभीरता से विचार कर रहे थे। लेकिन जब अमेरिका ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों सऊदी अरब और यूएई से समर्थन मांगा, तो दोनों देशों ने साफ तौर पर युद्ध में साथ देने से इनकार कर दिया। एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों देशों ने अमेरिका को चेतावनी दी कि ईरान के साथ सीधी जंग पूरे खाड़ी क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है। खासतौर पर तेल ठिकानों और ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। सऊदी अरब और यूएई का मानना है कि किसी बड़े सैन्य संघर्ष की स्थिति में सबसे पहले नुकसान खाड़ी देशों को ही उठाना पड़ेगा। यही वजह रही कि दोनों देशों ने सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया।

अब कतर की पहल पर बातचीत की कोशिश

तनाव के बीच अब कतर मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान और अमेरिका के बीच नए परमाणु समझौते को लेकर बातचीत की संभावना तलाश की जा रही है। हालांकि ईरान ने साफ कर दिया है कि वह होर्मुज स्ट्रेट और यूरेनियम ट्रांसफर जैसे मुद्दों पर किसी दबाव में समझौता नहीं करेगा। तेहरान का रुख अब भी काफी सख्त माना जा रहा है।

बदल रही है मध्य पूर्व की राजनीति?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम संकेत देता है कि मध्य पूर्व की राजनीति तेजी से बदल रही है। सऊदी अरब और यूएई अब केवल अमेरिका की रणनीति के साथ चलने के बजाय अपने आर्थिक और सुरक्षा हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं। हालांकि फरवरी-मार्च में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने के दौरान दोनों देशों ने चुपचाप ईरान समर्थित ठिकानों पर कार्रवाई की थी, लेकिन इस बार खुलकर युद्ध का समर्थन नहीं करना बताता है कि खाड़ी देश अब बड़े संघर्ष से बचना चाहते हैं। अमेरिका के लिए यह सिर्फ कूटनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि आर्थिक चेतावनी भी मानी जा रही है। क्योंकि अगर तेल संपन्न देशों का भरोसा कमजोर पड़ता है, तो उसका असर सीधे डॉलर और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।

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