ऑर्बिट से जासूसी? चीनी सैटेलाइट से ईरान का खेल-क्या TEE-01B बना नया 'स्पेस इंटेलिजेंस वेपन'?

Published : Apr 16, 2026, 06:41 AM IST

ईरान द्वारा चीन के TEE-01B सैटेलाइट के कथित उपयोग से US सैन्य ठिकानों की निगरानी के दावे सामने आए हैं। IRGC, स्पेस सर्विलांस, चीन-ईरान सहयोग और खुफिया गतिविधियों को लेकर वैश्विक सुरक्षा व भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

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Iran China Satellite Controversy: एक चौंकाने वाली रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन में विकसित और लॉन्च किया गया TEE-01B नामक सैटेलाइट बाद में ईरान के नियंत्रण में आकर सैन्य निगरानी के लिए इस्तेमाल किया गया। बताया जाता है कि यह सैटेलाइट चीनी कंपनी Earth Eye Co. द्वारा “इन-ऑर्बिट डिलीवरी” मॉडल के तहत संचालित था, जिसमें उपग्रह को कक्षा में स्थापित होने के बाद विदेशी खरीदारों को सौंप दिया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की एयरोस्पेस यूनिट ने इस सैटेलाइट का नियंत्रण हासिल किया और इसे खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की निगरानी के लिए तैनात किया।

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अमेरिकी ठिकानों पर नजर-संयोग या रणनीति?

दावा है कि TEE-01B ने सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस, जॉर्डन के मुवफ़्फ़क़ साल्टी एयर बेस, बहरीन में अमेरिकी फिफ्थ फ्लीट के आसपास के क्षेत्र, और इराक के एरबिल एयरपोर्ट जैसे संवेदनशील सैन्य प्रतिष्ठानों की निगरानी की। इसके अलावा कुवैत स्थित कैंप बुहरिंग (Camp Buehring) और अली अल सलेम एयर बेस (Ali Al Salem Air Base), जिबूती का कैंप लेमनियर (Camp Lemonnier) और ओमान का दुकम इंटरनेशनल एयरपोर्ट (Duqm International Airport) भी इसकी कथित निगरानी सूची में शामिल बताए गए हैं। रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि कुछ हमलों और क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों के दौरान इन निगरानी पैटर्न में वृद्धि देखी गई।

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 कमर्शियल नेटवर्क या खुफिया बुनियाद?

एक और गंभीर आरोप यह है कि ईरान को एम्पोसैट (Emposat) जैसे कमर्शियल सैटेलाइट नेटवर्क तक भी पहुंच मिली, जो कथित रूप से बीजिंग से संचालित ग्राउंड स्टेशन सेवाएं प्रदान करता है। विशेषज्ञों के हवाले से दावा किया गया कि इस तरह की पहुंच सैन्य-स्तरीय इंटेलिजेंस एकत्र करने में मददगार हो सकती है।

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चीन की भूमिका पर सवाल और वैश्विक चिंता

हालांकि चीन के विदेश मंत्रालय ने बार-बार किसी भी सैन्य सहायता या हस्तक्षेप से इनकार किया है, लेकिन पश्चिमी खुफिया सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि “पूरी प्रक्रिया बिना किसी सरकारी मंजूरी के संभव नहीं दिखती।” विश्लेषकों का मानना है कि अगर ये दावे सही हैं, तो यह खाड़ी क्षेत्र में शक्ति संतुलन और अंतरराष्ट्रीय निगरानी ढांचे के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। खासकर तब, जब ईरान पहले से ही मिसाइल और ड्रोन गतिविधियों को लेकर क्षेत्रीय तनावों के केंद्र में रहा है।

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बढ़ती तकनीकी जंग का नया अध्याय

सैटेलाइट टेक्नोलॉजी अब सिर्फ वैज्ञानिक या वाणिज्यिक उपकरण नहीं रह गई है, बल्कि यह भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का अहम हथियार बनती जा रही है। TEE-01B से जुड़ा यह विवाद इसी बदलते वैश्विक परिदृश्य की एक और झलक माना जा रहा है।

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