अस्थिर ईरान, तैयार चीन और पाकिस्तान: सत्ता परिवर्तन से भारत को क्यों हो सकता है बहुत बड़ा नुकसान?

Published : Jan 15, 2026, 01:23 PM IST

India Chabahar Port Future Risk: ईरान की अंदरूनी अस्थिरता भारत की स्ट्रेटेजिक योजनाओं के लिए कैसे खतरा बन सकती है? क्या इस उथल पुथल से इस इलाके में पाकिस्तान और चीन का पलड़ा भारी हो सकता है? चाबहार, व्यापार और सुरक्षा पर इसके असर को जानिए।

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Iran Leadership Change Impact On India: ईरान में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल भारत के लिए सिर्फ एक विदेशी संकट नहीं है, बल्कि यह भारत की सुरक्षा, व्यापार और रणनीति से सीधे जुड़ा मामला बनता जा रहा है। जैसे-जैसे ईरान का धार्मिक नेतृत्व बढ़ते विरोध प्रदर्शनों, आर्थिक संकट और राजनीतिक थकान से जूझ रहा है, भारत चुपचाप लेकिन गहरी चिंता के साथ हालात पर नजर बनाए हुए है। 

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क्या भारत को हो सकता है नुकसान?

ईरान और भारत के रिश्ते दशकों पुराने हैं। ये रिश्ते सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं, बल्कि भूगोल, रणनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय पहुंच से जुड़े हैं। अगर ईरान कमजोर हुआ या वहां सत्ता परिवर्तन हुआ, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत को क्यों हो सकता है?

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ईरान भारत के लिए इतना जरूरी क्यों है?

भारत के लिए ईरान सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि पश्चिम की ओर खुलने वाला एकमात्र भरोसेमंद दरवाज़ा है। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए भारत के ज़मीनी रास्ते बंद कर रखे हैं। ऐसे में ईरान ही भारत को उस क्षेत्र से जोड़ता है, जहां से ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक पहुंच मिलती है।

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चाबहार पोर्ट क्या भारत की रणनीतिक रीढ़ है?

चाबहार बंदरगाह भारत की सबसे अहम रणनीतिक परियोजनाओं में से एक है। यह बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच देता है। भारत ने इसमें अरबों डॉलर का निवेश किया है। अगर तेहरान में सत्ता संघर्ष बढ़ा, तो क्या चाबहार भी राजनीतिक अस्थिरता का शिकार हो जाएगा? विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नए शासन के साथ नीतियां बदल सकती हैं, और लंबे समय की योजनाएं खतरे में पड़ सकती हैं।

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क्या ईरान की कमजोरी से पाकिस्तान को फायदा होगा?

इतिहास गवाह है कि ईरान का शिया नेतृत्व अक्सर पाकिस्तान समर्थित सुन्नी चरमपंथी संगठनों के खिलाफ रहा है। यही वजह है कि ईरान कई बार भारत के पक्ष में खड़ा दिखा। अगर ईरान अंदरूनी तौर पर कमजोर पड़ता है, तो यह संतुलन टूट सकता है। इसका सीधा फायदा पाकिस्तान को मिलेगा, क्योंकि क्षेत्र में उसे रोकने वाला एक अहम खिलाड़ी कमजोर हो जाएगा।

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चीन इस पूरे खेल में कहां खड़ा है?

चीन पहले से ही ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है। पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते ईरान चीन पर और ज्यादा निर्भर होता जा रहा है-तेल, इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश हर क्षेत्र में। अगर ईरान में अराजकता बढ़ती है, तो नया शासन सुरक्षा और पैसे के लिए चीन की तरफ झुक सकता है। इससे भारत की मौजूदगी, खासकर चाबहार में, कमजोर पड़ सकती है।

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भारत के निवेश और व्यापार पर क्या असर पड़ेगा?

भारत और ईरान के बीच सालाना व्यापार 1.3 से 1.7 बिलियन डॉलर के बीच है। चाबहार समेत कई परियोजनाओं में भारत का बड़ा निवेश लगा हुआ है। सत्ता परिवर्तन का मतलब है-नीतियों में बदलाव, समझौतों की समीक्षा और निवेश पर खतरा। इसका सीधा असर भारतीय करदाताओं के पैसे पर भी पड़ सकता है।

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भारत को अब क्या रणनीति अपनानी चाहिए?

पूर्व राजनयिकों का मानना है कि भारत को न तो जल्दबाजी करनी चाहिए, न ही किसी एक नतीजे पर दांव लगाना चाहिए। भारत को चाहिए कि वह हालात पर लगातार नजर रखे, अपने नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दे और सभी संभावित परिदृश्यों के लिए तैयार रहे, क्योंकि अगर ईरान लंबे समय तक अस्थिर रहा, तो इसका असर सिर्फ वहीं नहीं रुकेगा-यह ऊर्जा बाजार, समुद्री रास्तों और पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

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