
मध्य पूर्व में हालात भले ही फिलहाल शांत दिखाई दे रहे हों, लेकिन पर्दे के पीछे हथियारों की दौड़ पहले से कहीं ज्यादा तेज हो चुकी है। अमेरिका और ईरान के बीच हालिया तनाव और सीमित सैन्य टकराव के बाद अब जो जानकारी सामने आ रही है, वह पूरे खाड़ी क्षेत्र के लिए चिंता बढ़ाने वाली है।
नई रिपोर्टों के अनुसार, युद्ध में हुए नुकसान के बावजूद ईरान ने अपनी सैन्य ताकत का बड़ा हिस्सा दोबारा खड़ा कर लिया है। मिसाइलों, ड्रोन और गुप्त लॉन्चरों का उसका नेटवर्क अब भी सक्रिय है और यही वजह है कि क्षेत्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ ईरान की सैन्य क्षमताओं पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
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अमेरिकी मीडिया संस्थानों की रिपोर्टों के मुताबिक, युद्ध से पहले ईरान के पास लगभग 3,000 बैलिस्टिक मिसाइलों का भंडार था। हालांकि संघर्ष के दौरान उसे नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन हालिया आकलन बताते हैं कि ईरान अपनी मिसाइल क्षमता का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा फिर से हासिल कर चुका है।
इसका मतलब है कि वर्तमान समय में उसके पास लगभग 2,100 बैलिस्टिक मिसाइलें मौजूद हो सकती हैं। ये मिसाइलें अलग-अलग दूरी तक हमला करने में सक्षम मानी जाती हैं और खाड़ी क्षेत्र के कई देशों को इनके दायरे में बताया जाता है।
सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई के दौरान ईरान के 69 गुप्त मिसाइल लॉन्चरों को निशाना बनाया था। इसके बावजूद ईरान ने इनमें से करीब 50 लॉन्चरों को फिर से सक्रिय कर लिया है। सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि गुप्त लॉन्चर किसी भी देश की मिसाइल रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं, क्योंकि इन्हें ट्रैक करना और समय रहते नष्ट करना बेहद कठिन होता है। इन्हीं लॉन्चरों के जरिए युद्ध की स्थिति में तेजी से जवाबी हमला किया जा सकता है।
मिसाइलों के अलावा ईरान का ड्रोन बेड़ा भी उसकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। विशेष रूप से शाहेद ड्रोन ने पिछले कुछ वर्षों में दुनिया का ध्यान खींचा है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के पास हजारों की संख्या में शाहेद ड्रोन मौजूद हैं। ये ड्रोन अपेक्षाकृत कम लागत में लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता रखते हैं। सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन पारंपरिक हथियारों जितने ही प्रभावशाली साबित हो रहे हैं।
ईरानी अधिकारियों के बयानों में कई बार यह संकेत दिया गया है कि यदि भविष्य में बड़े स्तर का संघर्ष होता है तो खाड़ी क्षेत्र के देश भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान की रणनीतिक निगाहें संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरीन और सऊदी अरब जैसे देशों पर बनी हुई हैं। ये सभी देश क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा समीकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
एनबीसी न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के रक्षा उत्पादन कार्यक्रम को चीन और रूस से तकनीकी एवं औद्योगिक सहायता मिलने के संकेत मिले हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन की कुछ कंपनियों ने हथियार निर्माण से जुड़े पुर्जों और तकनीक की आपूर्ति में भूमिका निभाई, जबकि रूस से भी रक्षा क्षेत्र से जुड़े उपकरण और सहयोग मिलने की बात कही गई है। हालांकि इन दावों पर संबंधित देशों की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
मई महीने में बीजिंग दौरे के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि चीन ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वह ईरान को हथियार उपलब्ध नहीं कराएगा। हालांकि ट्रंप के इस बयान पर चीन की तरफ से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई, जिससे इस मुद्दे पर कई सवाल अब भी बने हुए हैं।
सैन्य तनाव के बीच एक सकारात्मक संकेत यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते को लेकर बातचीत जारी है। रिपोर्टों के अनुसार, कतर और पाकिस्तान दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। प्रस्तावित समझौते में कुछ महत्वपूर्ण शर्तों की चर्चा हो रही है। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी के लिए खुला रखना और ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी शामिल बताई जा रही है।
ईरान की दोबारा मजबूत होती सैन्य क्षमता और साथ ही जारी कूटनीतिक वार्ताएं, दोनों मिलकर मध्य पूर्व की राजनीति को एक नए मोड़ पर ले जा रही हैं। एक तरफ मिसाइलों और ड्रोन का बढ़ता जखीरा क्षेत्रीय देशों की चिंता बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ परमाणु समझौते की संभावनाएं तनाव कम करने का रास्ता भी खोल सकती हैं। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि मध्य पूर्व हथियारों की नई दौड़ की ओर बढ़ता है या फिर कूटनीति के जरिए स्थिरता की दिशा में कदम रखता है।
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