
UAE Israel Relations: मिडिल ईस्ट में युद्ध भले ही फिलहाल थमता हुआ दिखाई दे रहा हो, लेकिन परदे के पीछे शुरू हुई नई कूटनीतिक लड़ाई अब खाड़ी देशों की चिंता बढ़ाने लगी है. खासकर संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE अचानक ऐसे विवाद के केंद्र में आ गया है, जिसने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा राजनीति को फिर से गर्म कर दिया है. अमेरिकी मीडिया की रिपोर्ट और इजराइल के ताजा दावों ने UAE को सीधे उस भू-राजनीतिक संघर्ष के बीच ला खड़ा किया है, जहां एक तरफ ईरान है और दूसरी तरफ इजराइल-अमेरिका का गठजोड़. सबसे बड़ा डर इस बात का है कि अगर ईरान और अमेरिका के बीच हुआ सीजफायर टूटता है, तो अगला निशाना UAE बन सकता है.
अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में दावा किया गया कि हालिया संघर्ष के दौरान UAE ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में भूमिका निभाई थी. हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट सामने आने के बाद खाड़ी क्षेत्र में हलचल तेज हो गई. इसी बीच Benjamin Netanyahu के कार्यालय की ओर से जारी बयान ने मामले को और संवेदनशील बना दिया. बयान में कहा गया कि जब ईरान की तरफ से UAE पर हमले हो रहे थे, तब नेतन्याहू ने अबू धाबी का दौरा किया था और यह यात्रा अब्राहम समझौते के तहत सहयोग का हिस्सा थी. संयुक्त अरब अमीरात ने इजराइल के इस दावे को खारिज कर दिया, लेकिन इजराइल लगातार UAE को अपना रणनीतिक सहयोगी बता रहा है.
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इजराइल और UAE के कथित सहयोग पर ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. Abbas Araghchi ने कहा कि तेहरान से दुश्मनी रखना खाड़ी देशों के लिए “मूर्खतापूर्ण जुआ” साबित हो सकता है. ईरान की ओर से आगे और “दंडात्मक कार्रवाई” की चेतावनी भी दी गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर बढ़ता है, तो UAE सीधे ईरानी हमलों की जद में आ सकता है.
फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार संघर्ष के दौरान ईरान ने UAE पर 2000 से ज्यादा हमले किए थे. इनमें सबसे ज्यादा निशाना दुबई और अबू धाबी को बनाया गया.
ईरानी विदेश मंत्री का दावा है कि UAE और इजराइल की करीबी की जानकारी तेहरान को पहले से थी, इसलिए रणनीतिक ठिकानों को टारगेट किया गया. मिडिल ईस्ट मामलों के जानकारों का कहना है कि दुबई और अबू धाबी केवल आर्थिक केंद्र नहीं हैं, बल्कि पश्चिमी देशों और खाड़ी राजनीति के अहम शक्ति केंद्र भी हैं. ऐसे में किसी भी बड़े संघर्ष की स्थिति में ये शहर सबसे संवेदनशील इलाकों में गिने जाएंगे.
वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध के बाद भी ईरान ने अपने करीब 70 प्रतिशत हथियारों को दोबारा सक्रिय कर लिया है. रिपोर्ट में कहा गया कि जंग शुरू होने से पहले ईरान के पास लगभग 3000 बैलिस्टिक मिसाइलें थीं. यही वजह है कि खाड़ी देशों में अभी भी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता बनी हुई है.
अब्राहम समझौता मिडिल ईस्ट की राजनीति में सबसे बड़े कूटनीतिक बदलावों में से एक माना जाता है. यह समझौता अमेरिका की मध्यस्थता में 13 अगस्त 2020 को शुरू हुआ था. इस समझौते के तहत United Arab Emirates और Israel के बीच आधिकारिक रिश्ते स्थापित हुए. बाद में बहरीन, सूडान और मोरक्को भी इसमें शामिल हो गए. इस समझौते का नाम हजरत इब्राहिम के नाम पर रखा गया, जिन्हें यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों में सम्मानित माना जाता है. इसे अरब देशों द्वारा इजराइल को मान्यता देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना गया.
कभी इजराइल को मान्यता देने से इनकार करने वाला UAE अचानक उसके साथ खड़ा क्यों दिखाई देने लगा? इसके पीछे कई रणनीतिक कारण बताए जाते हैं. सबसे बड़ा कारण मिडिल ईस्ट में ईरान का बढ़ता प्रभाव है. UAE और इजराइल दोनों ही ईरान को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं. यही वजह है कि दोनों देशों ने रक्षा, खुफिया जानकारी और साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाया. दूसरी बड़ी वजह आर्थिक और तकनीकी साझेदारी है. इजराइल साइबर सिक्योरिटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कृषि तकनीक और रक्षा तकनीक में दुनिया के अग्रणी देशों में गिना जाता है.
वहीं UAE अपनी अर्थव्यवस्था को केवल तेल आधारित मॉडल से बाहर निकालकर खुद को टेक्नोलॉजी और बिजनेस हब बनाना चाहता है. ऐसे में इजराइल के साथ मजबूत रिश्ते उसके लिए आर्थिक रूप से भी फायदेमंद माने जाते हैं.इसके अलावा अमेरिका के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना भी UAE की रणनीति का अहम हिस्सा रहा है.
भले ही फिलहाल सीजफायर लागू हो, लेकिन जिस तरह से UAE का नाम इस संघर्ष में सामने आ रहा है, उसने पूरे खाड़ी क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच तनाव दोबारा बढ़ता है, तो इसका सबसे बड़ा असर खाड़ी देशों पर पड़ सकता है. खासकर UAE जैसे देश, जो आर्थिक शक्ति होने के साथ-साथ रणनीतिक रूप से भी बेहद अहम हैं, आने वाले समय में सबसे ज्यादा दबाव झेल सकते हैं.
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