
Iran US War News: मिडिल ईस्ट में शांति की कोशिशें एक बार फिर अनिश्चितता के घेरे में हैं। पाकिस्तान में प्रस्तावित दूसरी मध्यस्थ वार्ता से पहले हालात तेजी से बदल रहे हैं। हॉर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती खींचतान ने बातचीत की संभावनाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी बीच बैकचैनल कूटनीति भी तेज हुई है, जहां पाकिस्तान की भूमिका अहम नजर आ रही है।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लेकर ईरान का सख्त रुख शांति प्रक्रिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। लेबनान में सीजफायर के बाद खोले गए इस अहम समुद्री रास्ते को ईरान ने 24 घंटे के भीतर फिर से बंद कर दिया। इससे साफ संकेत मिला कि तेहरान अपनी शर्तों से पीछे हटने को तैयार नहीं है। नतीजा यह हुआ कि प्रस्तावित वार्ता की टाइमिंग तक स्पष्ट नहीं हो पा रही है।
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रॉयटर्स के मुताबिक, पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से इस मुद्दे पर बातचीत की है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि हॉर्मुज की नाकेबंदी शांति वार्ता में बड़ी बाधा बन रही है। ट्रंप ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह इस सुझाव पर विचार करेंगे। यह बातचीत इस बात का संकेत है कि पर्दे के पीछे समाधान खोजने की कोशिश जारी है।
ईरान और अमेरिका के बीच लागू अस्थायी युद्धविराम की समयसीमा 21 अप्रैल को खत्म हो रही है। इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्ते के सीजफायर की घोषणा की थी। अब जैसे-जैसे यह समयसीमा खत्म होने के करीब है, दोनों पक्षों की बयानबाजी और सख्त होती जा रही है, जिससे तनाव और बढ़ने का खतरा है।
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में वार्ता के अगले दौर के लिए पहुंच सकते हैं। हालांकि, इस बार अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के शामिल होने की संभावना नहीं बताई जा रही है।
रविवार को इस्लामाबाद में उस वक्त हलचल तेज हो गई, जब नूरखान एयरबेस पर अमेरिकी सैन्य विमानों के उतरने की खबर सामने आई। इसके बाद सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई और रूट डायवर्जन की एडवाइजरी भी जारी की गई। यह सब संभावित वार्ता की तैयारियों का संकेत माना जा रहा था।
ईरान ने फिलहाल नई वार्ता को लेकर अनिश्चितता जताई है। तेहरान का मानना है कि अमेरिका जरूरत से ज्यादा शर्तें रख रहा है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने साफ कहा है कि उनका देश अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम और तकनीकी अधिकारों से कोई समझौता नहीं करेगा।
मौजूदा हालात यह दिखाते हैं कि शांति वार्ता की राह आसान नहीं है। एक तरफ हॉर्मुज स्ट्रेट जैसे रणनीतिक मुद्दे पर टकराव है, तो दूसरी तरफ दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी साफ नजर आ रही है। पाकिस्तान की मध्यस्थता कितनी कारगर साबित होगी, यह आने वाले दिनों में तय होगा। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या बातचीत का रास्ता खुलेगा या मिडिल ईस्ट एक बार फिर बड़े टकराव की ओर बढ़ेगा।
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