
ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव अब सिर्फ युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रह गया है। इसकी गूंज अमेरिका के भीतर भी तेज होती दिखाई दे रही है। हाल के दिनों में अमेरिकी मीडिया संस्थानों द्वारा जारी कई बड़े सर्वेक्षणों ने यह संकेत दिया है कि बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक ईरान को लेकर अपने राष्ट्रपति की नीति और फैसलों से संतुष्ट नहीं हैं। इतना ही नहीं, कुछ सर्वे में यह आशंका भी जताई गई है कि इस युद्ध के चलते अमेरिका के भीतर आतंकी खतरा बढ़ सकता है।
इन सर्वेक्षणों ने अमेरिकी राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। जहां एक ओर व्हाइट हाउस अपनी रणनीति को मजबूत बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी जनता का एक बड़ा वर्ग इस पूरी कार्रवाई को लेकर सवाल खड़े कर रहा है।
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28 फरवरी को अमेरिका ने इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर बड़ा सैन्य हमला किया था। इस कार्रवाई में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर सामने आई थी। माना जा रहा था कि इस हमले के बाद ईरान की सत्ता व्यवस्था कमजोर पड़ेगी और वहां बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिल सकता है।
लेकिन हालात उम्मीद के मुताबिक नहीं बदले। ईरान में न तो तख्तापलट हुआ और न ही वहां की सत्ता पूरी तरह कमजोर पड़ी। इसके उलट अब दोनों देशों के बीच समझौते और तनाव कम करने को लेकर बातचीत की खबरें सामने आ रही हैं।
हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स, एबीसी, सीएनएन और प्यू रिसर्च जैसे बड़े मीडिया संस्थानों ने ईरान युद्ध को लेकर अमेरिकी नागरिकों की राय जानने के लिए सर्वे किए। इन सभी सर्वे में अलग-अलग आंकड़े सामने आए, लेकिन एक बात लगभग समान रही कि बड़ी संख्या में लोग इस युद्ध की दिशा और अमेरिकी नीति को लेकर आशंकित हैं।
इस सर्वे में शामिल 50 प्रतिशत लोगों का मानना था कि केवल सैन्य दबाव या हमलों के जरिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म नहीं किया जा सकता। सिर्फ 22 प्रतिशत लोगों ने माना कि सैन्य शक्ति से यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
सर्वे में शामिल 52 प्रतिशत लोगों ने कहा कि युद्ध को बिना किसी बड़े समझौते के भी खत्म कर देना चाहिए ताकि हालात और ज्यादा न बिगड़ें।
वाशिंगटन पोस्ट और एबीसी के संयुक्त सर्वे में 69 प्रतिशत लोगों ने माना कि समझौते के बावजूद ईरान गुप्त रूप से अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रख सकता है। लोगों का कहना था कि अमेरिका ईरान को पूरी तरह रोक पाने में सफल नहीं होगा।
इसी तरह प्यू रिसर्च के सर्वे में लगभग दो-तिहाई लोगों ने कहा कि अमेरिका ईरान में अपने तय उद्देश्यों को हासिल नहीं कर पाएगा।
एबीसी के सर्वे में 61 प्रतिशत लोगों ने माना कि ईरान युद्ध के बाद अमेरिकियों के खिलाफ आतंकवाद का खतरा बढ़ सकता है। वहीं 49 प्रतिशत लोगों का कहना था कि इस संघर्ष से मध्य पूर्व की स्थिति और ज्यादा अस्थिर हो सकती है।
करीब 56 प्रतिशत लोगों ने यह भी माना कि इस युद्ध की वजह से अमेरिका के दूसरे देशों के साथ संबंध कमजोर पड़ सकते हैं।
सीएनएन के हालिया सर्वे में 59 प्रतिशत लोगों ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ईरान को लेकर सही फैसले नहीं ले पाएंगे। सिर्फ 22 प्रतिशत लोगों ने उनके फैसलों पर भरोसा जताया।
यह आंकड़े बताते हैं कि अमेरिकी जनता का एक बड़ा वर्ग इस युद्ध को लेकर असमंजस और चिंता की स्थिति में है।
इन सर्वे रिपोर्ट्स के सामने आने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिकी मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि अगर ईरान पूरी तरह सरेंडर भी कर दे, तब भी अमेरिकी मीडिया इसे अमेरिका की जीत नहीं बताएगा।
ट्रंप ने विपक्षी डेमोक्रेट नेताओं और मीडिया संस्थानों पर हमला बोलते हुए उन्हें “भटका हुआ” और “पागल” तक बता दिया। उनका कहना है कि मीडिया जानबूझकर उनकी विदेश नीति को कमजोर दिखाने की कोशिश कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के बाद अब अमेरिका के भीतर असली बहस युद्ध से ज्यादा उसकी रणनीति और परिणामों को लेकर हो रही है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या लगातार सैन्य दबाव से वास्तव में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोका जा सकता है या इससे क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ेगी।
इसके साथ ही आतंकवाद, वैश्विक संबंधों और मध्य पूर्व की सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं बढ़ रही हैं। आने वाले दिनों में यदि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ती है, तो यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों देशों के बीच तनाव कम हो पाता है या हालात और ज्यादा गंभीर दिशा में जाते हैं।
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