
दिल्ली का जंतर-मंतर आज देश में विरोध प्रदर्शन और आंदोलनों की बड़ी जगह के रूप में जाना जाता है। यहां राजनीतिक दलों से लेकर छात्र संगठन, किसान और सामाजिक संगठन तक अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जंतर-मंतर मूल रूप से आंदोलन करने के लिए नहीं बनाया गया था? इसके पीछे खगोल विज्ञान से जुड़ा इतिहास है। आइए जानते हैं जंतर-मंतर से जुड़े 5 अहम फैक्ट, किसने इसे बनाया था, यहां सबसे पहले किसने आंदोलन किया था?
दिल्ली के जंतर-मंतर का निर्माण जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने करवाया था। इसका निर्माण 1724 में हुआ। उस समय इसका मकसद खगोल विज्ञान से जुड़ी गणनाएं करना था।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 1993 में जंतर-मंतर पर शुरुआती दर्ज प्रदर्शनों में से एक दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष आशीष सूद के नेतृत्व में हुआ था। यह प्रदर्शन सरकारी फैसलों और छात्र हितों से जुड़े मुद्दों को लेकर किया गया था। इसके बाद से जंतर-मंतर को आधिकारिक धरना स्थल के रूप में स्थापित किया गया, क्योंकि इससे पहले बड़े प्रदर्शन इंडिया गेट के पास 'बोट क्लब' पर होते थे।
साल 2011 में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ यहां अनशन किया था। लोकपाल की मांग को लेकर हुए इस आंदोलन ने देशभर में चर्चा बटोरी। इसके बाद जंतर-मंतर की पहचान बड़े जन आंदोलनों के प्रमुख केंद्र के रूप में और मजबूत हुई।
जंतर-मंतर पर छात्र, किसान, कर्मचारी और सामाजिक संगठन अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते रहे हैं। भ्रष्टाचार, रोजगार, सरकारी नीतियों और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर यहां आवाज उठाई जाती रही है।
जंतर-मंतर में लगे यंत्रों का इस्तेमाल सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की स्थिति समझने के लिए किया जाता था। यहां सम्राट यंत्र, जयप्रकाश यंत्र और राम यंत्र जैसे उपकरण हैं। यानी जिस जगह का निर्माण आसमान की गणना के लिए हुआ था, वह समय के साथ लोगों की आवाज उठाने का प्रतीक भी बन गई
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