
देश की राजनीति में विरोध-प्रदर्शन और संवैधानिक अधिकारों को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने मौजूदा हालात की तुलना इमरजेंसी के दौर से करते हुए सरकार पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि आज के हालात उस दौर से भी बदतर हैं। उनके इस बयान ने राजनीतिक विवाद को नया मोड़ दे दिया है।
कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन से पहले कपिल सिब्बल ने कहा कि सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना जनता का संवैधानिक अधिकार है। उनके मुताबिक, यह अधिकार सरकार की देन नहीं है, इसलिए सरकार इसे मनमाने ढंग से छीन नहीं सकती।
सिब्बल ने आरोप लगाया कि युवाओं को ट्रेनों से उतारा गया। उन्होंने दावा किया कि प्रदर्शन पर रोक लगाने की कोशिशें दिखाती हैं कि सरकार आंदोलनकारियों का सामना नहीं कर पा रही है। हालांकि, इन आरोपों पर सरकार का पक्ष उपलब्ध जानकारी में सामने नहीं आया है।
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कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्होंने इमरजेंसी का दौर भी देखा है, लेकिन उनके आकलन में मौजूदा स्थिति उससे भी खराब है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कोई हिंसा करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन अहिंसक तरीके से प्रदर्शन करने वालों को रोकना क्यों जरूरी है? उन्होंने महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत का जिक्र करते हुए कहा कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अहिंसा की अहम भूमिका रही है। उनके मुताबिक, शांतिपूर्ण विरोध को रोकना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
सिब्बल ने दावा किया कि युवा सरकार के कामकाज से निराश हैं और आंदोलन आगे भी जारी रह सकता है। उन्होंने सरकार पर विभिन्न क्षेत्रों में विफल रहने का आरोप लगाया और कहा कि देश को आगे बढ़ाने की उम्मीद युवाओं से है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग का भी जिक्र किया और आरोप लगाया कि ऐसा होने पर सरकार की कई बातें सामने आ सकती हैं। ये सिब्बल के राजनीतिक आरोप हैं; इनकी स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित पक्षों का जवाब और अतिरिक्त तथ्य जरूरी हैं।
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