
तिरुवनंतपुरम: पोस्टल बैलेट की गिनती शुरू होने के बाद पहले आधे घंटे तक LDF खेमा 71 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी को लेकर आश्वस्त था। लेकिन जैसे ही नतीजे आने शुरू हुए, मंजेश्वरम से लेकर पारस्साला तक, पार्टी के किले एक-एक कर ढहते चले गए। चुनाव से ठीक पहले पार्टी छोड़ने वाले और UDF के समर्थन से लड़ने वाले पांच नेताओं ने CPIM के लिए दोहरी चुनौती खड़ी कर दी। इनमें से तीन जीत गए, एक बागी को जनता ने पूरी तरह नकार दिया, तो वहीं एक ने कांटे की टक्कर दी। पय्यन्नूर में वी. कुन्हीकृष्णन, तलिपरम्बा में टी.के. गोविंदन और अंबालापुझा में जी. सुधाकरन ने शानदार जीत दर्ज की। वहीं, कोट्टारक्करा में आयशा पोट्टी ने कड़ी टक्कर दी, जबकि ओट्टापालम में पी.के. ससी को भारी हार का सामना करना पड़ा।
पय्यन्नूर: भ्रष्टाचार के आरोप ने डुबोई नैया
पय्यन्नूर में मारे गए CPIM कार्यकर्ता धनराज के शहीद परिवार सहायता फंड में घपले का आरोप लगाकर वी. कुन्हीकृष्णन ने चुनाव से ठीक पहले सनसनी फैला दी थी। उन्होंने मौजूदा विधायक टी.आई. मधुसूदनन पर यह आरोप लगाया। एशियानेट न्यूज़ पर सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर वीनू वी. जॉन को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने यह बड़ा खुलासा किया था। जब CPIM ज़िला नेतृत्व ने चंदे का हिसाब देने से इनकार कर दिया, तो पय्यन्नूर जैसे लाल गढ़ में पार्टी के कार्यकर्ता ही खिलाफ हो गए। जब कुन्हीकृष्णन UDF के समर्थन से उम्मीदवार बने, तब भी CPIM नेतृत्व मान रहा था कि जीत पक्की है, बस मार्जिन थोड़ा कम हो सकता है। लेकिन नतीजों में वी. कुन्हीकृष्णन 7,487 वोटों के अंतर से जीत गए। यह वही सीट थी, जहां CPIM 40,000 वोटों से जीतती आई थी।
तलिपरम्बा: परिवारवाद बना बगावत की वजह
तलिपरम्बा में CPIM के उम्मीदवार की घोषणा ने टी.के. गोविंदन को नाराज़ कर दिया। CPIM के राज्य सचिव एम.वी. गोविंदन की पत्नी पी.के. श्यामला को उम्मीदवार बनाने के फैसले को उन्होंने अलोकतांत्रिक बताया। मंडल समिति की बैठक में भारी विरोध के बावजूद पार्टी ने फैसला नहीं बदला, जिसके बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी और चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। UDF ने उन्हें समर्थन दिया, जिससे मुकाबला कड़ा हो गया। तब भी CPIM को उम्मीद थी कि वे 3000 वोटों से सीट बचा लेंगे। लेकिन 16 में से 13 राउंड की गिनती पूरी होने तक टी.के. गोविंदन 13,000 से ज़्यादा वोटों की बढ़त बना चुके थे।
अंबालापुझा: 'गुरु' ने ही सिखाया सबक
जी. सुधाकरन सिर्फ CPIM के वरिष्ठ नेता ही नहीं थे, बल्कि वे पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए क्लास लेने वाले 'टीचर' भी थे। उनका मुख्य आरोप था कि उम्र का हवाला देकर उन्हें साइडलाइन कर घर बिठा दिया गया। जब वे कांग्रेस के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगे, तब भी CPIM नेतृत्व ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। जब चुनाव से ठीक पहले उन्होंने पार्टी की सदस्यता रिन्यू नहीं कराई, तब जाकर नेतृत्व को खतरे का एहसास हुआ। उन्हें मनाने की बहुत कोशिशें हुईं, लेकिन जी. सुधाकरन नहीं माने। वे आलाप्पुझा में पार्टी के मौजूदा नेताओं को अपनी ज़मीनी पकड़ का एहसास कराना चाहते थे। यहां भी UDF ने उनका साथ दिया। CPIM को फिर भी जीत का भरोसा था, लेकिन नतीजों ने दिखाया कि जनता ने मौजूदा विधायक एच. सलाम को नकार दिया। सुधाकरन 23,814 वोटों के भारी अंतर से एक बार फिर विधानसभा पहुंचे।
कहीं चूके, कहीं कांटे की टक्कर
UDF का गणित पी.के. ससी के मामले में गलत साबित हुआ, जिन्हें CPIM ने प्राथमिक सदस्यता से भी हटा दिया था। UDF को लगा था कि CPIM के गढ़ ओट्टापालम में ससी के ज़रिए वे जीत जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कार्यकर्ता पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के साथ खड़े रहे और एडवोकेट के. प्रेमकुमार 26,777 वोटों के बड़े अंतर से जीत गए।
वहीं, कोट्टारक्करा में आयशा पोट्टी को शिकायत थी कि उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया गया। वह सार्वजनिक जीवन से दूर हो गई थीं, लेकिन इस चुनाव में UDF उम्मीदवार के तौर पर वापसी की। उन्होंने वित्त मंत्री रहे के.एन. बालगोपाल को कड़ी टक्कर दी और बालगोपाल सिर्फ 1,072 वोटों के मामूली अंतर से ही जीत पाए।
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