
नई दिल्ली: देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर ऐतिहासिक लाल किले से इस बार एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने आजादी की लड़ाई की यादों को फिर से जीवंत कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में हुए स्वतंत्रता दिवस समारोह में पहली बार लाल किले पर राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का पूरा संस्करण बजाया गया। इसके बाद पारंपरिक रूप से राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की धुन गूंजी। इस खास मौके का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि इस वर्ष ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं।
लाल किले की प्राचीर से जैसे ही प्रधानमंत्री मोदी ने तिरंगा फहराया, पूरा वातावरण देशभक्ति के महा-उत्साह से सराबोर हो गया:
Historic.
For the first time, the National Song Vande Mataram is rendered during Independence Day celebrations at Red Fort. 🇮🇳 pic.twitter.com/C6JW9qUk8D— Varun ఉవాచ (@VKsaysso) August 15, 2026
‘वंदे मातरम’ सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है। इस साल इसके रचे जाने के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं, इसलिए स्वतंत्रता दिवस समारोह में इसकी प्रस्तुति का महत्व और बढ़ गया। स्वदेशी आंदोलन के दौरान यह गीत आम लोगों के बीच लोकप्रिय हुआ और आजादी की लड़ाई में इसे जोश और एकजुटता के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संबोधन में इसके ऐतिहासिक योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि स्वदेशी आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम’ आम लोगों का गीत बन गया था।
‘वंदे मातरम’ का इतिहास भी काफी दिलचस्प है। इसे शुरुआत में स्वतंत्र रूप से रचा गया था और बाद में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। साल 1896 में कोलकाता में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार गाया था। इसके कुछ वर्षों बाद यह स्वतंत्रता आंदोलन में एक प्रभावशाली राष्ट्रीय उद्घोष बन गया। सरकारी जानकारी के मुताबिक, 7 अगस्त 1905 को ‘वंदे मातरम’ का इस्तेमाल पहली बार राजनीतिक नारे के तौर पर किया गया था। यही वह दौर था जब बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन तेजी पकड़ रहा था।
इस वर्ष ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक और बड़ा बदलाव सामने आया है। हाल ही में इसके पूरे संस्करण को राष्ट्रगान के समान कानूनी सुरक्षा दी गई है। ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिलने के बाद राष्ट्रीय गीत की गरिमा को लेकर कानूनी प्रावधान और सख्त हुए हैं। संशोधित कानून के तहत ‘वंदे मातरम’ के गायन में जानबूझकर बाधा डालने या रुकावट पैदा करने पर जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान हो सकता है। दिलचस्प बात यह है कि 80वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले और उसके समापन पर भी ‘वंदे मातरम’ बजाया गया था।
इस साल जब ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं, तब लाल किले पर इसका पूरा संस्करण बजना केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की उस विरासत को याद करने का प्रतीकात्मक क्षण भी रहा, जिसने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ध्वजारोहण, 21 तोपों की सलामी, सेना के बैंड की ‘वंदे मातरम’ की धुन और उसके बाद राष्ट्रगान-80वें स्वतंत्रता दिवस का यह क्रम इतिहास, राष्ट्रभावना और आजादी की विरासत को एक साथ जोड़ता नजर आया।
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