14 डिसेंट नोट सामने आने के बाद CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष ने फिर मोर्चा खोल दिया है। संसद में हटाने के प्रस्ताव से लेकर 2023 के कानून में मिली कानूनी सुरक्षा तक, जानिए ज्ञानेश कुमार को पद से हटाना क्यों आसान नहीं है।
चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर सामने आई 14 आपत्तियों ने दिल्ली की सियासत गरमा दी है। चुनाव आयुक्त एसएस संधु और विवेक जोशी की ओर से अलग-अलग फैसलों पर दर्ज आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग तेज कर दी है। कांग्रेस समेत विपक्षी दल संसद में फिर से हटाने का प्रस्ताव लाने की तैयारी में हैं। लेकिन सवाल है कि क्या सिर्फ राजनीतिक दबाव से CEC को पद से हटाया जा सकता है? जवाब है—नहीं। इसके लिए संविधान में बेहद कठिन प्रक्रिया तय है।
14 डिसेंट नोट के बाद क्यों बढ़ा विवाद?
Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, एसएस संधु और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। इनमें मतदाता जोड़ने, नाम हटाने और SIR से जुड़े फैसले शामिल बताए गए हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने इन मतभेदों को सामान्य संस्थागत प्रक्रिया बताया और कहा कि प्रमुख फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
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विपक्ष फिर क्यों ला रहा महाभियोग प्रस्ताव?
रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग तेज कर दी है। कांग्रेस और INDIA ब्लॉक की ओर से दोनों सदनों में नया प्रस्ताव लाने की तैयारी की खबर है। इससे पहले भी इस साल दो नोटिस दिए जा चुके हैं।संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज के समान रखी गई है। यानी सामान्य प्रशासनिक आदेश से उनकी नियुक्ति खत्म नहीं की जा सकती।
संसद में बहुमत की राह क्यों कठिन?
महाभियोग प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए पहले निर्धारित संख्या में सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। इसके बाद दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना पड़ता है। यही वजह है कि किसी राजनीतिक दल या गठबंधन की ओर से प्रस्ताव लाना और उसका वास्तव में पारित हो जाना दो अलग-अलग चरण हैं। CEC को हटाने के लिए संसद में संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करना आवश्यक है।
2023 का कानून और Section 16 क्या कहता है?
2023 के Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act में आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान किए गए काम, फैसलों या दिए गए बयानों से जुड़े कुछ सिविल और आपराधिकन मामलों से CEC और चुनाव आयुक्तों को सुरक्षा दी गई है। Section 16 इसी सुरक्षा से संबंधित है। इसका मतलब यह नहीं है कि CEC को हर परिस्थिति में किसी भी कानूनी कार्रवाई से पूर्ण छूट हासिल है। सुरक्षा का दायरा कानून में बताए गए आधिकारिक कार्यों से जुड़ा है।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल विवाद के तीन प्रमुख मोर्चे हैं,संसद में प्रस्ताव, SIR को लेकर कानूनी और राजनीतिक चुनौती तथा चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों पर बहस। विपक्ष जहां इन घटनाओं को CEC की जवाबदेही से जोड़ रहा है, वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि अलग-अलग राय और टिप्पणियां संस्थागत deliberation का हिस्सा हैं। इसलिए आने वाले दिनों में सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि संसद की कार्रवाई, अदालतों में होने वाली सुनवाई और चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।
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