Lucknow Fire: मई में बुलडोजर का आदेश, जुलाई में क्लीन चिट! सिर्फ 2 महीने में क्यों बदला LDA का मूड?

Published : Jun 23, 2026, 09:46 AM IST
Lucknow Fire

सार

Lucknow Fire News: लखनऊ अग्निकांड में 15 मौतों के बाद बड़ा खुलासा। 2016 में जिस बिल्डिंग को गिराने का आदेश मिला था, 2 महीने बाद क्लीन चिट मिल गई। जानिए पूरा मामला 

Lucknow Aliganj Fire Inside Story: लखनऊ के अलीगंज में सोमवार को हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। इस हादसे में 15 लोगों की जान चली गई, जिनमें ज्यादातर स्टूडेंट्स थे। लेकिन अब सामने आई एक नई जानकारी ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस बिल्डिंग में आग लगी, उसे 2016 में अवैध निर्माण के आरोप में गिराने का आदेश दिया गया था। हैरानी की बात यह है कि महज दो महीने बाद वही आदेश वापस भी ले लिया गया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर इन दो महीनों में क्या हुआ, तो सिस्टम को अपना फैसला वापस लेना पड़ा?

10 साल पुरानी फाइल ने बढ़ाई बेचैनी

अब तक मिली जानकारी के अनुसार, अलीगंज के सेक्टर-D स्थित इस भवन को लेकर 2016 में कार्रवाई शुरू की गई थी। जांच में कथित अनधिकृत निर्माण (Unauthorized Construction) की बात सामने आने के बाद लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने मकान मालिकों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की। जांच पूरी होने के बाद 10 मई 2016 को बिल्डिंग को गिराने का आदेश जारी कर दिया गया, लेकिन बाद में फैसला बदल दिया गया।

मई में गिराने का आदेश, जुलाई में क्लीन चिट

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि 10 मई 2016 को जारी ध्वस्तीकरण आदेश (Demolition Order) 5 जुलाई 2016 को वापस ले लिया गया। यानी करीब दो महीने के भीतर LDA का रुख पूरी तरह बदल गया। अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस निर्माण को पहले अवैध मानते हुए तोड़ने का आदेश दिया गया, उसी पर बाद में कार्रवाई रोक दी गई। यही वजह है कि लखनऊ अग्निकांड के बाद 2016 की यह फाइल फिर चर्चा में आ गई है।

आखिर किसकी थी यह बिल्डिंग?

  • इस 1,992 स्क्वायर फीट की विवादित जमीन और इमारत का इतिहास कई तरह के सवाल खड़े करता है।
  • 11 जुलाई 1980 को अलीगंज योजना के सेक्टर-डी में यह प्लॉट मूल रूप से विजय कुमार को लॉटरी के ज़रिए अलॉट हुआ था। नवंबर 1980 में पजेशन मिला।
  • 2005 में बिक्री विलेख (Deed of Sale) के जरिए रजिस्ट्री की गई। 2013 में नए मालिकों को बेचा गया।
  • 20 अगस्त 2014 को विजय कुमार से यह प्रॉपर्टी वीरेंद्र प्रताप शुक्ला और सुरेंद्र शुक्ला ने खरीदी। एलडीए (LDA) ने इसका नक्शा सिर्फ रहने के लिए (Residential Plan) पास किया।
  • 10 मई 2016 को बिल्डिंग में धड़ल्ले से कमर्शियल और अवैध निर्माण किया गया। शिकायत मिलने पर जांच हुई और एलडीए ने इसे गिराने (Demolition Order) का सख्त आदेश जारी कर दिया।
  • 5 जुलाई 2016 को महज 2 महीने (60 दिन) के अंदर एलडीए ने अपना ही फैसला पलट दिया। गिराने का आदेश वापस (Revoked) ले लिया गया।

आग वाले दिन क्या हुआ?

सोमवार, 22 जून की दोपहर अलीगंज के उषा मेहता मार्ग स्थित तीन मंजिला इमारत में अचानक आग लग गई। आग इतनी तेजी से फैली कि कई लोग अंदर ही फंस गए। सबसे ज्यादा प्रभावित दूसरी मंजिल रही, जहां एनीमेशन ट्रेनिंग सेंटर में छात्र मौजूद थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कुछ लोगों ने जान बचाने के लिए इमारत से छलांग तक लगा दी। फायर ब्रिगेड की 14 गाड़ियों ने कई घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया, लेकिन तब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी थी।

क्या यह हादसा टल सकता था?

यही वह सवाल है जो अब हर किसी के मन में है। अगर 2016 में जारी ध्वस्तीकरण आदेश लागू रहता, बिल्डिंग की स्थिति की दोबारा सख्ती से जांच होती और सुरक्षा मानकों की समीक्षा होती, तो शायद इतना बड़ा हादसा न होता। इन सभी सवालों का जवाब अभी जांच के दायरे में है, लेकिन पुरानी फाइलों ने पूरे मामले को नया मोड़ जरूर दे दिया है।

SIT जांच में क्या-क्या होगा फोकस?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले की जांच के लिए SIT गठित की है। टीम को 7 दिनों में रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं। एसआईटी अवैध निर्माण के आरोप, 2016 का ध्वस्तीकरण आदेश और उसका निरस्तीकरण, बिल्डिंग का इस्तेमाल, अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच करेगी। इसके बाद कार्रवाई की जाएगी। अभी तक हादसे के बाद पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार किया है। इसके अलावा लापरवाही के आरोप में चार अधिकारियों को निलंबित भी किया गया है।

 

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